बुधवार, 29 जुलाई 2015

अब क्या कहें

तेरे हाथ में दस्ताना और जुबाँ पर दोस्ताना है
तेरे किरदार का कुछ तो अंदाज कातिलाना है

चोट हर बार बेशक नई से नई किस्सा तो पुराना है
थैली में विष तो मुट्ठी में हँसता हुआ हर्जाना है

शर्म आती बहुत जो यह सलूक बहुत बहशियाना है
जुल्म, जुमला, जुर्म को जो कहता करतूत मर्दाना है

दर्द तेरा हो कि मेरा हो प्रेमचंदी निगाह में सारा जमाना है
बिगाड़ के डर से ईमान की बात जानता हर कोई छिपाना है

हालात ऐसे कि आवाम बे-कदर अपने ही गम से बेगाना है
मेरी जान सच मान हँसी तेरी अब भी खुशी का खजाना है

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें