सरकार बनानेवाला संसदीय दल या दलों का समूह संसद में पक्ष और सरकार बनाने की प्रक्रिया से बाहर के दल या दल समूह विपक्ष कहलाता है। पक्ष का हो या विपक्ष का संसदीय दल अपने-अपने राजनीतिक दलों से इस अर्थ में भिन्न होता है कि राजनीतिक दल का प्रत्येक सदस्य जनप्रतिनिधि नहीं होता है जबकि संसदीय दल का प्रत्येक सदस्य होता है। जैसे सरकार पूरे देश की होती है वैसे ही विपक्ष भी सारे देश का होता है। दलों के राजनीतिक हितों का अनिवार्य विरोध और संघर्ष संसदीय हितों के अनिवार्य टकराव या विरोध में बदल जाये तो अंततः जनतंत्र क्षतिग्रस्त हो जाता है। राजनीतिक जन संघर्ष और संसदीय जनप्रातिनिधिक संघर्ष के तरीके और तमीज में अगर फर्क मिटा दिया गया तो संसद के सत्र कामकाज के बदले राजनीतिक रैलियों में बदल कर रह जाने से खुद को बचा नहीं पायेंगे। यह जनतंत्रीय व्यवस्था के लिए शुभ नहीं है।
किसी मुद्दे पर सिर्फ उन लोगों को, जिनका दलीय अवस्थान जगजाहिर है और जिनका अपना मत अपने विवेक के बदले अपने दल से ही तय होने के लिए बाध्य है को बुलाकर मीडिया में चर्चा करना चर्चा को कोलाहल में बदलना है। मीडिया को चाहिए कि वह खुद को पूरी तरह से पॉलिटिकल स्फीयर में बदलने से यथासंभव बचते हुए पब्लिक स्फीयर में बने रहने की कोशिश करे। सरकार के समर्थन या विरोध के बदले नीतियों और मुद्दों के औचित्य या अनऔचित्य पर उन लोगों के लिए जगह बनाये जो न तो संसद में बोल सकते हैं न सड़क पर बोल सकते हैं, लेकिन जिनका बोलना महत्त्व का हो सकता है।
अन्यथा देश और देश की व्यवस्था को अबांछित फाट से बचाना बहुत मुश्किल होता जायेगा।
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सोमवार, 24 अगस्त 2015
जनतंत्र में पक्ष विपक्ष
शनिवार, 22 अगस्त 2015
अनहद नाद
ज्ञान की चरमावस्था मौन है।
मौन में शब्द नहीं होता नाद होता है।
शब्द में ध्वनि होती है नाद में व्याप्ति।
यह व्याप्ति जब अव्याप्ति में बदलती है तब नाद अनहद हो जाता है और आदमी कबीर।
अनहद के ऊपर प्रेम होता है - - - एकै अषिर पीव का कहते हैं कबीर। इसलिए प्रेम ही सबसे बड़ा गुरु है सबसे बड़ा पाठ!
गुरुवार, 20 अगस्त 2015
लग गई बोली
जनतंत्र की ये हँसी ठिठोली!
लो बिहार की लग गई बोली!
आये लेकर भरी हवाई झोली!
हँसकर धीरे-से मुट्ठी खोली!
ये बिहार है और जनता है भोली
पैसे से मिलती नहीं यहाँ रंगोली
जयकारे में मगन मूर्खों की टोली
काशी अब कोशी ने सुनी ठिठोली
शनिवार, 15 अगस्त 2015
टचयुग की महिमा : टचमेव जयते
शुक्रवार, 14 अगस्त 2015
जश्न-ए-आजादी
जश्न - ए-आजादी में हूँ शरीक जरूर
मगर भुलाये नहीं बनता कि हम ने
कई बेड़ियाँ बनाई अपनों के लिए
कबूल हो दिल से कि उन जज्बातों को
भूलते चले गए जो थे जरूरी बहुत पुर-अम्न आजादी के सपनों के लिए
बात बढ़ाने का फायदा ही क्या मुख्तसर यह कि हम मुफीद बनते चले गए चाहे जैसे भी हो मुमकिन आजादी में अड़चनों के लिए
न ख्वाबों को जिलाये रख सके न हकीकतों और ना ही हकों के लिए कुछ खास कर सके, न बहुवचनों के लिए
जब संवेदनशीलता ही चुक गई तो संवाद क्या सब कुछ समर्पित होना ही था बेशर्म बतकुच्चनों के लिए
जश्न - ए-आजादी में हूँ शरीक जरूर
मगर भुलाये नहीं बनता कि हम ने
कई बेड़ियाँ बनाई अपनों के लिए
बुधवार, 29 जुलाई 2015
अब क्या कहें
तेरे हाथ में दस्ताना और जुबाँ पर दोस्ताना है
तेरे किरदार का कुछ तो अंदाज कातिलाना है
चोट हर बार बेशक नई से नई किस्सा तो पुराना है
थैली में विष तो मुट्ठी में हँसता हुआ हर्जाना है
शर्म आती बहुत जो यह सलूक बहुत बहशियाना है
जुल्म, जुमला, जुर्म को जो कहता करतूत मर्दाना है
दर्द तेरा हो कि मेरा हो प्रेमचंदी निगाह में सारा जमाना है
बिगाड़ के डर से ईमान की बात जानता हर कोई छिपाना है
हालात ऐसे कि आवाम बे-कदर अपने ही गम से बेगाना है
मेरी जान सच मान हँसी तेरी अब भी खुशी का खजाना है
शनिवार, 18 जुलाई 2015
तालीम-तलब से बगरू
हकीकत में ना जाने क्यों बहुत उकरू लगता हूँ
किसी बात पर अड़ जाता और जकरू लगता हूँ
कमजोर भीतर से कि बाहर से जबरू लगता हूँ
ऐसी लड़ाई खुद से कि खुद को झगरू लगता हूँ
बक-बक बक-बक करता इतना बकरू लगता हूँ
तकौनी में बीती जिंदगी तीसरा पठरू लगता हूँ
ऋण-मुक्त नींद की चाह विकल बदरू लगता हूँ
हमकलामी में तालीम-तलब से बगरू लगता हूँ
फिर-फिर लौटता इस मामले में हेहरू लगता हूँ