सोमवार, 24 अगस्त 2015

जनतंत्र में पक्ष विपक्ष

सरकार बनानेवाला संसदीय दल या दलों का समूह संसद में पक्ष और सरकार बनाने की प्रक्रिया से बाहर के दल या दल समूह विपक्ष कहलाता है। पक्ष का हो या विपक्ष का संसदीय दल अपने-अपने राजनीतिक दलों से इस अर्थ में भिन्न होता है कि राजनीतिक दल का प्रत्येक सदस्य जनप्रतिनिधि नहीं होता है जबकि संसदीय दल का प्रत्येक सदस्य होता है। जैसे सरकार पूरे देश की होती है वैसे ही विपक्ष भी सारे देश का होता है। दलों के राजनीतिक हितों का अनिवार्य विरोध और संघर्ष संसदीय हितों के अनिवार्य टकराव या विरोध में बदल जाये तो अंततः जनतंत्र क्षतिग्रस्त हो जाता है। राजनीतिक जन संघर्ष और संसदीय जनप्रातिनिधिक संघर्ष के तरीके और तमीज में अगर फर्क मिटा दिया गया तो संसद के सत्र कामकाज के बदले राजनीतिक रैलियों में बदल कर रह जाने से खुद को बचा नहीं पायेंगे। यह जनतंत्रीय व्यवस्था के लिए शुभ नहीं है।
किसी मुद्दे पर सिर्फ उन लोगों को, जिनका दलीय अवस्थान जगजाहिर है और जिनका अपना मत अपने विवेक के बदले अपने दल से ही तय होने के लिए बाध्य है को बुलाकर मीडिया में चर्चा करना चर्चा को कोलाहल में बदलना है। मीडिया को चाहिए कि वह खुद को पूरी तरह से पॉलिटिकल स्फीयर में बदलने से यथासंभव बचते हुए पब्लिक स्फीयर में बने रहने की कोशिश करे। सरकार के समर्थन या विरोध के बदले नीतियों और मुद्दों के औचित्य या अनऔचित्य पर उन लोगों के लिए जगह बनाये जो न तो संसद में बोल सकते हैं न सड़क पर बोल सकते हैं, लेकिन जिनका बोलना महत्त्व का हो सकता है।
अन्यथा देश और देश की व्यवस्था को अबांछित फाट से बचाना बहुत मुश्किल होता जायेगा।

शनिवार, 22 अगस्त 2015

अनहद नाद

ज्ञान की चरमावस्था मौन है।
मौन में शब्द नहीं होता नाद होता है।
शब्द में ध्वनि होती है नाद में व्याप्ति।
यह व्याप्ति जब अव्याप्ति में बदलती है तब नाद अनहद हो जाता है और आदमी कबीर।
अनहद के ऊपर प्रेम होता है - - - एकै अषिर पीव का कहते हैं कबीर। इसलिए प्रेम ही सबसे बड़ा गुरु है सबसे बड़ा पाठ!

गुरुवार, 20 अगस्त 2015

लग गई बोली

जनतंत्र की ये हँसी ठिठोली!
लो बिहार की लग गई बोली!
आये लेकर भरी हवाई झोली!
हँसकर धीरे-से मुट्ठी खोली!

ये बिहार है और जनता है भोली
पैसे से मिलती नहीं यहाँ रंगोली
जयकारे में मगन मूर्खों की टोली
काशी अब कोशी ने सुनी ठिठोली

शनिवार, 15 अगस्त 2015

टचयुग की महिमा : टचमेव जयते

शास्त्र-पुराणों की बात नहीं जानता। बस इतना समझ में आ रहा कि न सत युग, न कलियुग यह टचयुग है। हर तरफ टच की महिमा है। टच की महिमा से काक पिक, बक मराल बन जाता है ▬▬ बिन टच कुछ काम न होई, टच करो देवा! टच है तो सारे काम चट से हो जाते हैं। टच न हो तो सारे मंसूबों को कोई भी चट कर जाता है। टच से साधारण मिठाई प्रसाद में बदल जाता है। आइडियोलॉजी को टच कर लेने पर बहुत आसानी से बकवास विचार में बदल जाता है। कोई बड़े काम पर निकलता है तो मंदिर को टच करते हुए निकलता है। बड़े साहेब से मिलने के पहले बड़े बाबू को टच कर लेना लाभजनक होता है। छात्र परीक्षा हॉल में घुसने के पहले पुस्तक को फाइनल टच देता है। फाइनल टच माने परीक्षा खत्म हो जाने के बाद जीवन में फिर कभी उसे टच करने की कोई जरूरत नहीं रह जाती है। प्रत्याशी बनने का लाभ उन्हें ही मिल पाता है जो टचाशी बनने में सफल होते हैं।

हमने देखा है, वे जो भी कहते हैं टच करने के बाद ही कहते हैं। उनकी बात टच कर जाती है। वे टचेश्वर हैं उनको टच करने का हक है। कोई दूसरा उन्हें क्या उनके घेरे के आस-पास को भी टच करे तो वे बड़े टची हो जाते हैं। कुछ टच बाबा तो जेल चले गये हैं, सुना है वे वहाँ भी टचयोग में लगे हुए हैं बाकी टचस्वामी बाहर में ही टचहील कर रहे हैं। इस टच काल में भाग्य लक्ष्मियाँ टच विद्या और टच निपुणता पर ही मुग्ध होती हैं; भागती लक्ष्मियाँ भी। अब नामकरण में भी युगानुरूप बदलाव दिखना चाहिए। नया नाम कुछ इस प्रकार का हो सकता है ▬▬ टचनाथ, टचेंद्र, टचकारी, टचोदय, टचकिशोर, टचभद्र, टचख्यान, टचू बाबू, टचराज, टचेश्वरी, टचकी, टचीता, टचांगी, टचानी आदि। गानों में कहा जायेगा ▬▬ तू कहीं भी जाये मेरा टच तेरे साथ होगा। युवा झूमते हुए गायेंगे ▬▬ वो साँई मेरा भी टच करवा दे, नहीं पूरा तो थोड़ा करवा दे, दे दे कोई तो टच करवा दे। बस-ट्रेन के अधिकतर नित्य यात्री टचा-टची की कृपा से ही आवगमन के कष्ट को हँसते-हँसते सह लेते हैं।

‘बड़े स्मार्ट हो जी’ कहने पर प्रशंसा का वह सुरूर कहाँ चढ़ता है जो ‘बड़े टचाश हो जी’ कहने पर चढ़ता है। मन झूमकर आँखों-आँखों में कहता है ▬▬▬ बार-बार कहो, टचाश कहलाना अच्छा लगता है। टचाश विज्ञापन ▬▬ आनंद भरपूर, टचानंद; टच करो, चट करो। अभी टचकारी बाबू कह गये हैं, आपका कुछ नहीं हो सकता, आप किसी के टच में नहीं रहते हैं। खैर अभी वक्त है। टच में रहने की कोशिश कीजिये। उनकी बातें टच कर गई हैं। हाय टचकारी बाबू! आप भी क्या खूब टच करते हो! अब कभी मौका आया तो पत्र ‘आदरणीय श्री’ से नहीं कर, ‘टचश्री’ शुरू करने का तथा समापन ‘आपका कृपाकांक्षी’ या ‘आपका स्नेहाकांक्षी’ जैसी सड़ियल मनोरथ-विज्ञापी पदों से नहीं कर ‘आपका टचाकांक्षी’ या ‘आपका टचाशी’ जैसे चट-असरकारी पदों से करने का इरादा पक्का होता जा रहा है। आपकी बात आप जानें.. मैं तो आपका टचाकांक्षी...
टचमेव जयते 

शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

जश्न-ए-आजादी

जश्न - ए-आजादी में हूँ शरीक जरूर
मगर भुलाये नहीं बनता कि हम ने
कई बेड़ियाँ बनाई अपनों के लिए

कबूल हो दिल से कि उन जज्बातों को
भूलते चले गए जो थे जरूरी बहुत पुर-अम्न आजादी के सपनों के लिए

बात बढ़ाने का फायदा ही क्या मुख्तसर यह कि हम मुफीद बनते चले गए चाहे जैसे भी हो मुमकिन आजादी में अड़चनों के लिए

न ख्वाबों को जिलाये रख सके न हकीकतों और ना ही हकों के लिए कुछ खास कर सके, न बहुवचनों के लिए

जब संवेदनशीलता ही चुक गई तो संवाद क्या सब कुछ समर्पित होना ही था बेशर्म बतकुच्चनों के लिए

जश्न - ए-आजादी में हूँ शरीक जरूर
मगर भुलाये नहीं बनता कि हम ने
कई बेड़ियाँ बनाई अपनों के लिए

बुधवार, 29 जुलाई 2015

अब क्या कहें

तेरे हाथ में दस्ताना और जुबाँ पर दोस्ताना है
तेरे किरदार का कुछ तो अंदाज कातिलाना है

चोट हर बार बेशक नई से नई किस्सा तो पुराना है
थैली में विष तो मुट्ठी में हँसता हुआ हर्जाना है

शर्म आती बहुत जो यह सलूक बहुत बहशियाना है
जुल्म, जुमला, जुर्म को जो कहता करतूत मर्दाना है

दर्द तेरा हो कि मेरा हो प्रेमचंदी निगाह में सारा जमाना है
बिगाड़ के डर से ईमान की बात जानता हर कोई छिपाना है

हालात ऐसे कि आवाम बे-कदर अपने ही गम से बेगाना है
मेरी जान सच मान हँसी तेरी अब भी खुशी का खजाना है

शनिवार, 18 जुलाई 2015

तालीम-तलब से बगरू

यूँ तो तस्वीरों में कभी खुद को सुर्खरू लगता हूँ
हकीकत में ना जाने क्यों बहुत उकरू लगता हूँ

किसी बात पर अड़ जाता और जकरू लगता हूँ
कमजोर भीतर से कि बाहर से जबरू लगता हूँ

ऐसी लड़ाई खुद से कि खुद को झगरू लगता हूँ
बक-बक बक-बक करता इतना बकरू लगता हूँ

तकौनी में बीती जिंदगी तीसरा पठरू लगता हूँ
ऋण-मुक्त नींद की चाह विकल बदरू लगता हूँ

हमकलामी में तालीम-तलब से बगरू लगता हूँ
फिर-फिर लौटता इस मामले में हेहरू लगता हूँ