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शनिवार, 9 अगस्त 2014

नागार्जुन की भाषा-दृष्टि

नागार्जुन ने कई भारतीय भाषाओं में कविता को संभव किया था। हिंदी के अलावे मैथिली, बाँग्ला, संस्कृत में उनकी कई कविताएँ उपलब्ध हैं। कुछ अन्य भाषाओं में कविता लिखे जाने की सूचना भर उपलब्ध है। नागार्जुन हिंदी के बड़े कवि हैं। किसी भी बड़े रचनाकार की रचनाओं को कई दृष्टिकोण और दृष्टि-बिंदुओं से समझे जाने की जरूरत हमेशा ही बनी रहती है। भारत अपने-आप में बड़ा है। इस बड़े भारत के बड़े कवि को समझने के लिए भी बड़े फलक की जरूरत है। मैथिली नागार्जुन की मातृभाषा थी। मैथिली न सिर्फ उनकी मातृभाषा थी बल्कि मैथिली से उनको बड़ा गहरा लगाव भी था। खास बात यह कि मैथिली से उनके गहरे लगाव और अनुराग ने अन्य भाषाओं के प्रति उनके लगाव और अनुराग को कम नहीं किया था, बल्कि बढ़ाया ही था। ‘नागार्जुन मैथिल थे। मैथिली उनकी मातृभाषा थी। वे मैथिली में भी लिखते थे। वे सिर्फ मैथिली में ही नहीं बांग्ला और संस्कृत में भी लिखते थे। मैथिली का होना उनके लिए हिंदी का होने में बाधक नहीं सहायक और आवश्यक ही था। इसलिए मैथिली के साथ ही वे हिंदी के भी उतने ही थे। विचार किया जाना चाहिए कि यह जानने के बावजूद कि जो कद मिलना हिंदी में संभव है, वह बांग्ला और संस्कृत में तो नहीं ही संभव है, शायद मैथिली में भी संभव नहीं है; नागार्जुन उन भाषाओं में लिखने का जोखिम उठाने से हिचकते नहीं थे तो उसके पीछे क्या सोच सक्रिय हो सकता है? अँगरेजी में कभी हाथ आजमाया नहीं, इस बारे में भी सोचना चाहिए। यह भी, कि आज हम सिर्फ हिंदी में ही लिखने को क्यों काफी मानते हैं! 

यह देखना चाहिए कि मैथिली में लिखना नागार्जुन के लिए हिंदी महाजातीयता की अपनी जड़ों से जुड़े रहने, बांग्ला में लिखना हिंदी महाजातीयता की निकटवर्ती जातीयता की संवेदना से जुड़ने और संस्कृत में लिखना छुटी हुई जीवंत संवेदना को भी हिंदी महाजातीयता में बनाये रखने की आवश्यकता की समझ से कितना अर्थवान है।’ (संदर्भः नवोन्मेष की चुनौती के सामने हिंदी समाज और साहित्य)। यहाँ यह भी याद रखने की जरूरत है कि ‘सामाजिकता का एक और महत्त्वपूर्ण अधार है भाषा। भाषा अपने आप में एक ऐसी सामाजिक शक्ति है जिसके साथ बहुत अधिक छेड़-छाड़ संभव नहीं हुआ करता है। इधर संचार माध्यमों की प्रभुता ने लेकिन सफलतापूर्वक देशी भाषाओं के साथ छेड़-छाड़ प्रारंभ किया है। कहना न होगा कि मातृभाषा का अपना महत्त्व हुआ करता है। निश्चित रूप से इसे स्वीकार करना ही चाहिए। लेकिन राष्ट्रभाषाओं या राजभाषाओं का भी अपना महत्त्व हुआ करता है। राष्ट्रीय जीवन में इसकी अवहेलना नहीं की जा सकती है, नहीं की जानी चाहिए। मातृभाषा प्रेम राष्ट्र या राजभाषा के प्रति दुराव या घृणा का आधार नहीं बन सकता है। इधर, मातृभाषा प्रेम के लिए विश्व स्तर पर नये सिरे से अभियान चलाया जा रहा है। मातृभाषा के नाम पर भावनात्मक शोषण अधिक आसान होता है। इसलिए मातृभाषा प्रेम के इस नये आग्रह के अंतर्निहित मूल अभिप्राय को धैर्य और सावधानी से समझना होगा। असल बात यह है कि बाजार अपनी स्वाभाविक धारक और शासक भाषा (Covering & Governing Language) के रूप में तो अंग्रेजी को चाहती है लेकिन लोकरंजन (Language of Entertainment) के महत्त्व को भी जानती है। इसलिए बाजार अपना लिखित कारोबार तो अंग्रेजी में करता है क्योंकि वह बहुत गोचर नहीं होता है लेकिन बोलचाल में अंग्रेजी मिश्रित भाषाओं को प्रश्रय देने की मुहिम को हवा देता है। वह बड़ी तेजी से हिंग्रेजी (हिंदी+अंग्रेजी) और बंग्रेजी (बांग्ला+अंग्रेजी) आदि जैसी भाषिक संरचनाओं को आकार देने के प्रयोग पर दत्तचित्त होकर काम कर रहा है। इसे भाषाओं के बीच आदान-प्रदान के नैसर्गिक प्रवाह समझना भूल है। इसके पीछे की उनकी सक्रियता और धूर्त्तता को समझना ही होगा। धूर्त्तता यह कि बांग्ला, हिंदी आदि पार्श्ववर्ती भाषाओं की नैसर्गिक निकटता किसी प्रकार बढ़ने न पाये बल्कि धीरे-धीरे दूरियाँ बढ़े। हिंग्लिश (हिंदी+इंग्लिश) और (बांग्ला+इंग्लिश) बंग्लिश का विकास तेजी से हो लेकिन किसी भी प्रकार से बांग्दी (बांग्ला+हिंदी) आदि के विकास की कोई सामाजिक आकांक्षा न बने। बल्कि, दूरियाँ इतनी बढ़े कि उनकी बोलियाँ और शैलियाँ भी उन से अपने स्वाभाविक, ऐतिहासिक, सामाजिक संबंधों को नकार दें। सामासिक एकता के सारे सामाजिक संबंध-सूत्र बाहरी दबाव और आंतरिक तनाव को झेल नहीं पायें और बिखर जाएँ।’ (संदर्भः आलोचना और समाज) एक खास बात लक्षित की जा सकती है कि किसी के प्रति गहरा लगाव और अनुराग बड़प्पन की सीमा नहीं शक्ति बनता है। नागार्जुन की रचनाशीलता के विविध आयामों पर गौर करने से यह सहज ही भासित होने लगता है कि नागार्जुन का गहरा लगाव और अनुराग जिन से भी था, वे कभी उनकी रचनाशीलता और उनके व्यक्तित्व की सीमा नहीं बन पाये। नागार्जुन का बुद्ध विचार से गहरा लगाव और अनुराग था लेकिन इसने मार्क्सवाद से उनके लगाव को कभी कम नहीं किया। 

मार्क्सवाद के प्रति गहरा लगाव और अनुराग कभी उनकी राष्ट्रीय चेतना को कम नहीं कर पाई। चीन के संदर्भ में ही नहीं कई संदर्भों में लिखी उनकी कविताएँ साक्ष्य के तौर पर पढ़ी जा सकती हैं। वर्तमान के प्रति गहरा सरोकार कभी अतीत या भविष्य में उनकी आवाजाही को बाधित नहीं कर पायी। सफलकाम को अपनाने के लिए उन्होंने पूर्णकाम न हो सकनेवालों को त्याज्य नहीं प्रणम्य ही समझा। नागार्जुन ने रास्ते में मिले लोहे के गट्ठर को उठाने के लिए कभी लकड़ी के गट्ठर को कंधे से उतार नहीं फेंका और न सोने के गट्ठर को उठाने के लिए लोहे के गट्ठर को उतार फेंका। बल्कि रास्ते में जो भी काम का मिला उसे समेटते हुए चले। देश के प्रति लगाव कभी उनके देशातीत होने में बाधक नहीं हो पाया।

शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

बोलियों का सवाल

बोलियों, खासकर हिंदी से जुड़ी बोलियों का सवाल नये सिरे से उठ खड़ा हुआ है। विकास के नये माहौल में अस्मिताओं की नई कसमाहट को इसका कारण माना जा सकता है। आजादी के आंदोलन के दौरान अस्मिताओं की तलाश में बने राष्ट्र-बोध और आज के राष्ट्र-बोध में गुणात्मक अंतर आया है। एक बात समझनी होगी कि नकारात्मक रवैये से अस्मिताओं के उठान की प्रक्रियात्मक जटिलताओं को सुलझाया नहीं जा सकेगा। भाषा के सवालों को सामाजिकता के सवालों से अलग कर समझा नहीं जा सकता है। समाजव्यवस्था का मूलाधार जिन कतिपय तत्त्वों से निर्मित होता है कहना न होगा कि उन में भाषा की उपस्थिति लगभग अनिवार्य होती है। इधर हिंदी लेखकों का एक वर्ग उभर रहे इस राष्ट्र-बोध में अस्मिताओं के साथ बोलियों, जिन्हें इससे जुड़े लोगों का एक बड़ा वर्ग भाषाओं के रूप में चिह्नित करता है, की अनिवार्य उपस्थिति को लेकर काफी चिंतित है। कुछ हद तक उनकी चिंता जायज है। उनकी चिंता कुछ कम हो सकती है, यदि वे उभर रहे नये राष्ट्र-बोध के साथ समाजव्यवस्था, जिसे व्यापक रूप से आर्थिक व्य्वस्था से भी जोड़कर समझना चाहिए, के स्वरूप में आ रहे बदलाव को उसके सही परिप्रेक्ष्य में ग्रहण कर सकें। सही परिप्रेक्ष्य को ग्रहण करना इसलिए भी दुष्कर है कि बोलियों के सवालों को भाषा के सवाल के रूप में उठानेवालों के एक वर्ग में इस नये राष्ट्र-बोध के अनुक्रम में समाजव्यवस्था और अर्थव्यवस्था के विस्तार में न जाकर राजनीति और सच पूछिये तो साहित्यिक राजनीति के भँवर में फँसा हुआ है। कुछ लोगों के अति उत्साही विचार से हिंदी क्षेत्र में ही हिंदी विरोध की दुखद हवा बनती जा रही है। इन दोनों वर्गों के लोगों को समझना होगा। ऐसे बहुत सारे लोग हैं जो इनमें से किसी के भी तर्क से पूरी तरह सहमत नहीं हैं। ऐसे लोग एक ओर तो हिंदी लेखकों के एक वर्ग के द्वारा बोलियों के पैरोकार के रूप में हिंदी द्रोही के रूप में प्रचारित किये जा रहे हैं, तो दूसरी ओर बोलियों के अति उत्साही पक्षधरों के द्वारा बोलियों के विरोधी के रूप में चिह्नित किये जा रहे हैं। इस दो तरफा खतरा के जोखिम को उठाते हुए भी इस पर विचार किया जाना जरूरी है।

बोलियों के सवालों पर हिंदी लेखकों का यह वर्ग वही सारे तर्क दे रहा है जो भिन्न भंगिमा से हिंदी के सवालों पर संस्कृत का पक्षधर दिया करता था; या घुमा-फिराकर अंगरेजी को अनिवार्य मनवाने के लिए दिया जाता है। भाषाएँ अपनी सामाजिक जरूरतों से प्रचलन में बनी रहती हैं न कि सिर्फ बौद्धिक जरूरतों से। हिंदी को सिर्फ बौद्धिक जरूरतों की भाषा मानकर चलनेवाले लोग अधिक परेशान हैं। इनको लगता है कि बोलियों के माध्यम से सामाजिक जरूरतें तो पहले ही पूरी होती रही हैं यदि इनकी बौद्धिक जरूरतें भी बोलियों के माध्यम से पूरी होने लग जायेंगी तो हिंदी के भविष्य को ग्रहण लग जायेगा। यह विडंबना ही है कि भारत में सामाजिक और बौद्धिक जरूरत की भाषा हमेशा भिन्न रही है। बौद्धिक जरूरत की भाषा कभी संस्कृत तो कभी अरबी-फारसी, अंगरेजी आदि रही है, जबकि सामाजिक जरूरतें अन्य भाषाओं के माध्यम से पूरी होती थी। हिंदी को ठीक अंगरेजी की जगह बिठने के उत्साह के मूल में कई व्याघातक भ्रम हैं, रघुवीर सहाय एवं उन जैसे लोगों के जेहन में इस भ्रम से उत्पन्न ब्याधि के खतरे से सावधान बने रहने का भाव सदा सक्रिय रहा है। सच्ची बात तो यह है कि हिंदी को सामाजिक जरूरत की भाषा के रूप में पहचान नहीं पाना हिंदी बौद्धिकों को हिंदी की बोलियों की समृद्धि से हिंदी के खतरे में पड़ जाने के भ्रम में डाल देता है। इस भ्रम के बाहर का सच यह है कि हिंदी भाषी इलाके में हिंदी बौद्धिक जरूरत की और हिंदी भाषी इलाके से बाहर समाजिक जरूरत की भाषा की दृष्टि से सफलतापूर्वक व्यवहार में है। किसी भी भाषा समूह के लोगों के लिए इतर भाषा समूह के लोगों से समाजिक संपर्क की स्वाभाविक भारतीय भाषा के रूप में हिंदी की स्वीकृति और प्रतिष्ठा का कारण हिंदी की अपनी बनावट में है। इतर भाषा समूह के लोगों के साथ सामाजिक संपर्क हर भाषा समूह के लोगों की सामाजिक जरूरत है। इसलिए हिंदी की सामाजिक जरूरत कोई कम नहीं है। कहना न होगा कि हिंदी, अपने विभिन्न भाषिक रूपों में भारत राष्ट्र की इस सामाजिक जरूरत को दक्षता के साथ पूरा करती है। अपने भाषा क्षेत्र से बाहर बौद्धिक जरूरत को हिंदी किस हद तक पूरा करती है यह जरूर सोचने की बात है। अपने क्षेत्र में बौद्धिक जरूरत और अपने क्षेत्र से बाहर सामाजिक जरूरत की भाषा होना हिंदी की विशिष्ट स्थिति है। 

अपनी तमाम सीमाओं और अवरोधों के बावजूद हिंदी आज सिर्फ हिंदी भाषियों की जरूरत नहीं है। स्वाभाविक रूप से हिंदी राष्ट्र की जरूरत है। ऐसे में हिंदी लेखकों के किसी वर्ग को हिंदी के किसी खतरे में होने की चिंता में परेशान होने की जरूरत नहीं है। हिंदी के लिए जब अन्य भारतीय भाषाएँ किसी प्रकार की परेशानी नहीं खड़ी करती हैं तो वे बोलियाँ या भाषाएँ कैसे परेशानी में डालेंगी जिसने हिंदी की बुनियाद को मजबूत बनाने में योगदान किया है? जो लोग हिंदी क्षेत्र की बोलियों या भाषाओं पर बात करने तक को लगभग राष्ट्र-द्रोह से जोड़कर देखते हैं वे लोग अपनी जड़ों से कटने के कारण उत्पन्न सामाजिक एवं राष्ट्रीय खतरे को अनदेखा करने के गुनहगार साबित होंगे। यह गुनाह हिंदी के हित को तो क्षतिग्रस्त करेगा ही, राष्ट्र-हित को भी कम क्षतिग्रस्त नहीं करेगा। 

आजादी के आंदोलन के दौरान जैसे-जैसे भारतीय राष्ट्र का रूप स्पष्ट हो रहा था, अस्मिताओं का मिजाज भी स्पष्ट हो रहा था। बड़ों के सामने छोटों का दब जाना एक स्वाभाविक-सा प्राकृतिक नियम है। इतिहास साक्षी है कि अस्मिताओं को धर्म से जोड़कर द्विराष्ट्रीयता का इतना बड़ा दबाव क्षेत्र बना दिया गया कि छोटी अस्मिताओं के लिए पर्याप्त स्पेस नहीं बचा। धर्म के नाम पर भारत से अलग होनेवाले पाकिस्तान में भाषायी अस्मिताओं के सवालों का इतना बड़ा बवंडर उठा कि पूर्वी पाकिस्तान के बांग्लादेश बन जाने पर ही शांत हुआ। जातियों, धर्मों, भाषाओं की बहुलात्मकता से उत्पन्न अस्मिताओं का अस्तित्व भारत का अपना सच है। भाषाओं से जुड़ी अस्मिताओं में क्षेत्रीय तत्त्व का स्वाभाविक समावेश होने से भाषायी अस्मिताएँ अधिक ठोस और तीखी हैं। हमारे राष्ट्र-नायकों में संभवतः सबसे पहले लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने 1891 में ही भाषायी आधार पर राज्य और इस अर्थ में राष्ट्र के पुनर्गठन की जरूरत को रेखांकित किया था। तिलक ने भारत की प्रशासनिक इकाइयों के गठन को भिन्न प्रकार की ऐतिहासिक परिस्थितियों के प्रवाह में या फिर आकस्मिक रूप से हो गया मानते हुए भाषायी आधार पर इनके पुनर्गठन को हितकारी माना था। भाषायी आधार पर प्रशासनिक इकाइयों के पुनर्गठन से इनमें समरसता आने और देशी भाषाओं को अपने-अपने क्षेत्र में प्रोत्साहन मिलने जैसे दो बड़े लाभ का उन्होंने संकेत किया था। देशी भाषा के इस्तेमाल में नई चेतना के उभार का सांस्कृतिक पक्ष के अलावे अपना एक राजनीतिक पक्ष भी था। इस दौर में हम राजनीति के विवेकीकरण की प्रक्रिया को सक्रिय थी जबकि आज भारत में विवेक के ही राजनीतिकरण की प्रक्रिया सक्रिय है। जिस भाषा के साहित्य के हम लेखक हैं उस भाषा के समाज से हर स्तर पर हमारा जुड़ाव स्वाभाविक होना चाहिए। पाठकों के अभाव का रोना रोते हुए हिंदी लेखक को एक क्षण के लिए ठहरकर सोचना चाहिए कि अपने पाठक के तन-मन और जीवनयापन पर पड़नेवाली चोटों की कितनी तीव्र अनुगूँजों को वह सुन पा रहा है। यह कैसी विडंबना है कि जो लोग हिंदी-भाषी होने के कारण विभिन्न स्तर पर लांछित- प्रताड़ित होते हैं उनका मूल समाज उनको हिंदी भाषी के रूप में पहचान नहीं पाता है। ज्ञान के स्तर पर थोड़ा-बहुत पहचान भी लेता है संवेदना के स्तर पर बिल्कुल ही नहीं पहचान पाता है।

आजादी के आंदोलन के दौरान उत्तर और दक्षिण भारत की जो अर्थ-व्यंजना थी वह आज से भिन्न थी। आज धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहे उत्तर भारतीय पद में सिर्फ हिंदी भाषी माना जानेवाला इलाका शामिल है। विशेषण के रूप में भाषा के बदले भूगोल के प्रयोग के निहितार्थ को भी पढ़ा जाना चाहिए। उत्तर भारतीय पद की अर्थ-व्यंजना के अंतःकरण का इस्तेमाल अनात्मीयकरण के लिए हो रहा है। कहना न होगा कि अंतःकरण को उपकरण में बदलकर हासिल वर्चस्व ही वह तत्त्व है जो अपने एवं पराये, `हम' एवं `अन्य' या भीतरी एवं बाहरी का आधार बनाता है। रोजी-रोजगार और आर्थिक गतिविधियों में इस आधार की बड़ी भूमिका पारस्परिक व्यवहार और विनिमय में अंतर्विरोध पैदा करता है। भाषा से जुड़े किसी भी सवाल पर बात करते समय समाज को उससे बाहर रखना एक बुनियादी गलती है। जिसे हम हिंदी भाषी कहते हैं उसकी आत्मा भोजपुरी, मगही, मैथिली, बुंदेली, संथाली, नागपुरी आदि में ही मुखरित होती है; रोती है, गाती है। रघुवीर सहाय के अनुभव को याद करें तो भाषा को शक्ति देने की प्रार्थना करके पिटता हुआ यह समाज भारत राष्ट्र में अपने बचे रहने का ही आश्वासन माँग रहा है। दूसरी ओर यह भी सच है कि हिंदी से विलगाव या विरोध बचे रहने के ऐसे किसी दुष्प्राप्य आश्वासन के पूरा होने की संभावना को क्षतिग्रस्त ही करता है। सच बात तो यह है कि हिंदी के सामने असली चुनौती राष्ट्र की बौद्धिक जरूरत को पूरा करने के साथ ही अपने क्षेत्र की सामाजिक जरूरत को पूरा करनेवाली बोलियों के लिए सम्मानजनक जगह बनाने की है।

गुरुवार, 7 अगस्त 2014

भाषा के व्यवहार के आग्रह में हमारे तर्क का आधार बहिष्कारात्मक होता है





भाषा व्यवहार पर धीरे-धीरे बात जोर पकड़ रही है। खासकर, हिंदी के साथ अन्य भारतीय भाषाओं के बोलनेवालों के संबंध के बारे में। राजकीय कार्यकलाप में हिंदी के प्रयोग के बारे में भी बात हो रही है। लोगों का अपना-अपना पक्ष है और उस पक्ष के अपने-अपने तर्क हैं। जिन्हें हिंदी के पक्षकार हिंदी की बोली मानते हैं, उन बोलियों की तरफ से भी बात उठ रही है। इस पर तार्किक ढंग से गौर किया जाना चाहिए। 



मैथिली को संवैधानिक रूप से अलग भाषा के रूप में स्वीकृति मिल चुकी है। जब भोजपुरी, ब्रज, अवधी, छत्तीसगढ़ी जैसी भाषाओं की, अलग भाषा के रूप में, संवैधानिक स्वीकृति की बात उठती है, तब हिंदी के पक्षकारों में सबसे ज्यादा बेचैनी बढ़ जाती है। उनके तर्कों के केंद्र में एक भावनात्मक सवाल होता है कि यदि ये सभी भाषाएँ स्वतंत्र भाषा के रूप में स्वीकृति हासिल कर लेंगी तो हिंदी का क्या होगा! हिंदी का क्या होगा, यानी हिंदी को संकट से बचाने के लिए इन भाषाओं की स्वतंत्र संवैधानिक स्वीकृति से बचना जरूरी है! अब भोजपुरी, ब्रज, अवधी, छत्तीसगढ़ी जैसी भाषाओं के पक्षकार पूछते हैं कि यदि हिंदी को संकट से बचाने के लिए अपने अस्तित्व को तिलांजलि दे दें तो भोजपुरी, ब्रज, अवधी, छत्तीसगढ़ी जैसी भाषाओं का क्या होगा, इस पर हिंदी के पक्षकार क्यों नहीं सोचते। दोनों ही तरफ से बहुत ही भावुक तर्क है, जिसका सार है कि यह अस्तित्व को बचाने का संघर्ष है। अस्तित्व बचाने के इस संघर्ष को कुछ लोग अस्मिता के संघर्ष के रूप में भी समझे और माने जाने का प्रस्ताव करते हैं। इस पर गंभीरता से सोचना चाहिए।


किसी ‘दूसरे’ के ‘अस्तित्व’ को बचाने के लिए कोई अपने अस्तित्व को समाप्त करने के फैसले के साथ क्यों होगा! हिंदी के पक्षकार लगे हाथ यह सवाल भी ठोक देते हैं कि यदि इन्हें स्वतंत्र भाषा की स्वीकृति मिल जायेगी तो वे अपने बच्चों की शिक्षा उसी भाषा में देने के लिए तैयार हो जायेंगे न? हालाँकि, इनके पास इस बात का कोई जवाब नहीं होता है कि हिंदी के पक्षकारों के बच्चों की शिक्षा का माध्यम अंगरेजी क्यों बनती है! 

हिंदी के विद्वान अपनी मातृभाषा, यदि कोई हो तो, के अलावे हिंदी की सहभाषा अर्थात, भोजपुरी, ब्रज, अवधी, छत्तीसगढ़ी जैसी किसी ‘अपनी भाषा’ को ही क्यों नहीं सीखते! अन्य भारतीय भाषाओं के पक्षकारों की तरफ से भी हिंदी के पक्षकारों से यही सवाल पूछा जाता है कि एक तमिल (उदाहरण के लिए) तो हिंदी सीखता है, जानता है, लेकिन एक हिंदी भाषी में तमिल सीखने का आग्रह क्यों नहीं होता! अर्थात, एक तमिल हिंदी क्यों सीखे! यह कोई नहीं पूछता कि एक तमिल (उदाहरण के लिए) तो अंगरेजी सीखता है लेकिन अंगरेजों या अंगरेजी के पक्षकारों से भी तमिल सीखने का वैसा ही आग्रह तमिल का पक्षकार क्यों नहीं करता है। अंगरेजी के पक्षकारों में जब तमिल सीखने को आग्रह नहीं है तो कोई तमिल अंगरेजी क्यों सीखे, यह कोई नहीं पूछता!

एक बात साफ है कि भाषा के व्यवहार के आग्रह में हमारे तर्क का आधार बहिष्कारात्मक होता है, अंगरेजी अपवाद है। और सच पूछिये तो हिंदी भी अपवाद है। हिंदी सीखने का आग्रह हिंदी के हित से संचालित नहीं होता है। जैसे अंगरेजी सीखने का आग्रह भी अंगरेजी के हित से संचालित नहीं होता है। भाषा के व्यवहार का तर्क हमेशा जरूरत और व्याप्ति के आधार पर ही तय होता है। कोलकाता में हो या चेन्नै में जहाँ पूरे भारत के लोग रहते हैं वहाँ उनके बीच में संपर्क की व्यावहारिक भाषा हिंदी ही होती है, यदि किसी अन्य तरह का दबाव सक्रिय न हो। एक गुजराती एक पंजाबी से किस भारतीय भाषा में बात करता है, एक बांग्ला भाषी किसी तेलगू भाषी से किस भारतीय भाषा में बात करेगा, निश्चित रूप से हिंदी में। इसी तरह से एक भोजपुरी भाषी किसी मैथिली भाषी से भी हिंदी में ही बात करता है। अपवाद की बात अलग है लेकिन, एक तेलगू भाषी जब अपनी शिक्षा की माध्यम भाषा चुनता है तो वह या तो अंगरेजी को चुनेगा या तेलगू को, हिंदी को नहीं चुनेगा। इसी प्रकार, एक नेता पूरे भारत के साधारण नागरिकों को जब संबोधित करता है तो हिंदी का इस्तेमाल करता है। अकारण नहीं है कि एच डी देवेगौड़ा या सोनिया गाँधी जैसे नेता हिंदी सीखने लगते हैं। लेकिन इन्हें जब शासन करना होता है तो वे अंगरेजी का ही व्यवहार करते हैं। यानी हिंदी राजनीतिक, सामाजिक, व्यापारिक संपर्क और संवाद की भाषा के रूप में स्वीकृत है लेकिन ज्ञान, आधिकारिकता और शक्ति (शासन) की भाषा बनना इसके लिए अब भी चुनौती है। हिंदी को यह चुनौती मुख्यतः शासन के अंतःपुर के मिजाज और गौणतः अंगरेजी के रुआब की तरफ से है। 

मेरा अनुभव है कि संपर्क और संवाद की भाषा को तो बिना बहुत मेहनत के भी, कई बार अनायास ही, अर्जित किया जा सकता है लेकिन, ज्ञान और शासन की भाषा को सीखने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है, चाहे वह आपकी मातृभाषा के प्रारूप में ही क्यों न हो। क्योंकि ज्ञान और शासन की भाषा किसी की मातृभाषा हो ही नहीं सकती है। जिन्हें हिंदी भाषी माना जाता है या जो अपने को हिंदी भाषी मानते हैं वे हिंदी को ज्ञान और शक्ति की भाषा के रूप में अर्जित करने के लिए सामान्यतः कोई इच्छा भी नहीं रखते, विशेष उद्यम भी नहीं करते हैं; तात्कालिक तत्परता से आगे बढ़ नहीं पाते। इस तरह से देखें तो, तत्परता और उद्यम के अभाव के कारण भी अंगरेजी की चुनौती बड़ी है। तमाम राजनीतिक कारण धरे-के-धरे रह जायेंगे और ज्ञान, संवेदना और शक्ति (शासन) की भाषा के रूप में सक्षम होने पर हिंदी के व्यवहार का रास्ता आसान हो जायेगा ▬▬ इतना आत्मविश्वास और इतनी मेहनत का हौसला हिंदी के पक्षकारों में तो होना ही चाहिए। हिंदी के पक्षकारों में आत्मविश्वास और मेहनत के हौसला का अभाव अपनी ही बोलियों के अस्तित्व की माँग को हिंदी के अस्तित्व पर खतरे की तरह देखता रहता है। इनकी हालत उस रोगी की तरह है जो दवा को जहर और जहर को दवा मानने पर उतारू हो जाता है। मेरा इस तरह से सोचना कुछ लोगों की नजर में अपराध सरीखा है ▬▬ एक तरफ तो, हिंदी के पक्षकार को मेरी बात हिंदी के हित की विरोधी लगती है, दूसरी तरफ हिंदी की सहभाषाओं के पक्षकारों को भी ऐसा ही लगता है। मैं इस मुद्दे पर इसी तरह से सोचता हूँ। 

एक निवेदन करना जरूरी है, यहाँ बार-बार ‘पक्षकार’ शब्द का इस्तेमाल करना मेरे लिए भी बहुत ही पीड़ादायक रहा है, लेकिन मेरे पास कोई उपाय नहीं था इस के इस्तेमाल से मुँह चुराने का।