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सोमवार, 2 मार्च 2015

नागरिक जमात एक संभावना

समांतर, जनसत्ता 24 मार्च 2015: उम्मीद का आकाश

स्तब्धकारी असंतुलित बहुमत के साथ सत्ता में आई आम आदमी पार्टी के अंदर घमासान जारी है। साबित हो रहा है, बेहाल होते हैं हम जिसके अभाव से, उसके प्राचूर्य से भी कम परेशान नहीं होते हैं। जब नहीं होता कोई विरोध तो विरोध अपने अंदर से पैदा होता है। चुनौतियाँ हमें एक करती हैं, खतरे हमें साथ बनाये रखते हैं। चुनौतियों और खतरे का एहसास न रहे, तो हम एक साथ नहीं रह पाते हैं। वैसे, सबसे बड़ा खतरा तो यही हो गया कि ‘अराजनीतिक नागरिक जमात’ शासक दल में बदल गया और नागरिक जमात अपनी संभावनाओं के भँवर में छिन्न-भिन्न हो गया। फिर भी, यदि आम आदमी पार्टी इस अभूतपूर्व विपक्षहीनता में सकारात्मक ढंग अपने विपक्ष का रचाव करने में सफल होने की संभावनाओं को घटना में बदल लेने में कामयाब होती है, तो यह भारतीय जनतंत्र की संरचनागत सफलताओं की मिसाल होगा। संगठित राजनीतिक दल में अपने विपक्ष के रचाव की संभावना लगभग न के बराबर होती है। आखिर आम आदमी पार्टी में अभी तक संयोजक ही काम कर रहा है, कोई अध्यक्ष, चेयरपर्सन नहीं तो इसका अर्थ समझा जाना चाहिए।

इस समय मोटे तौर पर नागरिक जमात सन्नाटे में हैं। अण्णा आंदोलन के दौरान आकार पाये नागरिक जमात के राजनीतिक दल में बदल जाने के कारण लगे झटका से अभी नागरिक जमात उबर नहीं पाया है। यह पहले भी हुआ है। महात्मा गाँधी के नेतृत्व में चला भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष अपने मूल चरित्र में नागरिक जमात का ही संघर्ष था। धीरे-धीरे काँगरेस जिस अनुपात में एक राजनीतिक दल में बदलती चली गई उसी अनुपात में काँगरेस में गाँधी राजनीति के लिए जगह कम होती चली गई। इस क्रम में गाँधी काँगरेस से बाहर हो गये और काँगरेस गाँधी विचार के प्रभाव से बाहर। महात्मा गाँधी के मत और कार्य पद्धति से उस समय के महत्त्वपूर्ण लोगों का गंभीर मत भेद था। इस गंभीर मत भेद के बावजूद न तो महात्मा गाँधी उन लोगों के लिए सर्वथा उपेक्षणीय बन गये और न महात्मा गाँधी के लिए वे लोग अन्यथा हो गये। महात्मा गाँधी की कार्य पद्धति से देर तक और दूर तक जुड़े लोग नागरिक जमात के रूप में सक्रिय रहे। उनकी अपनी स्वाभाविक कमियाँ थीं। इन कमियों के बावजूद महात्मा गाँधी की कार्य पद्धति से जुड़े नागरिक जमात का अपने समय के राजनीतिक जमात से द्वंद्वात्मक रिश्ते की सकारात्मकता बची हुई थी। यह भी सच है कि एक और, काँगरेस के कुछ बड़े लोग महात्मा गाँधी की कार्य पद्धति से जुड़े नागरिक जमात को काँगरेस से नत्थी मानकर चल रहे थे। दूसरी और, महात्मा गाँधी की कार्य पद्धति से जुड़े नागरिक जमात के भी कई लोग अपनी इस नियति की करुण भविष्य लिपि को पढ़ रहे थे। अंततः काँगरेस की नीतियाँ अपने से जुड़े या अपने साथ विकसित नागरिक जमात को निष्प्रभ करती चली गई। एक बार जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में जो आंदोलन चला वह अपने आंतरिक चरित्र में नागरिक जमात की ही अभिव्यक्ति था। लगातार हो रहे छोटे-छोटे सामाजिक आंदोलन अपने प्रारंभ में नागरिक जमात की आकांक्षा के रूप में ही विकसित होते हैं। हालाँकि, ये सामाजिक आंदोलन कदम-दो-कदम चलते ही किसी न किसी संगठित राजनीतिक दल से जाने-अनजाने नत्थी हो जाते हैं। अपरिपक्व सामाजिक आंदोलन के संगठित राजनीतिक दल में बदल या उससे नत्थी हो जाने से नागरिक जमात को भारी धक्का लगता रहा है। नागरिक जमात के उभार का तो हमें थोड़ा-बहुत अनुभव है, लेकिन उसे राजनीतिक जमात में बदल जाने से रोकने का कोई अनुभव नहीं है।

विराजनीतिकरण की और बढ़ते समय में नागरिक जमात के सन्नाटे को तोड़ना बहुत जरूरी है। हालाँकि, अण्णा आंदोलन में उभरे नागरिक जमात के बाद में राजनीतिक दल में बदल जाने से नागरिक जमात की विश्वसनीयता को बहाल करना काफी कठिन हो गया है। आनेवाले दिनों में हमारी आंतरिक संरचना में नये किस्म के तनाव के उभार के साथ ही पुराने अंतर्विरोध की अति सक्रियता से भी परेशानी बढ़ने की गहरी आशंका है। इससे आशंका से निबटने में नागरिक जमात की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। आशंकाएँ क्या हैं! आशंकाएँ हैं, सांप्रदायिक, सामुदायिक, लैंगिक, आर्थिक, राजनीतिक बहिष्करण और असहिष्णुता। देश के विभिन्न संप्रदायों और समुदायों के बीच परस्पर अविश्वास बढ़ रहा है। इनके हितों के टकराव की स्थिति में सरकारों की संतुलनकारी भूमिका की जरूरत जितनी बढ़ रही है उसी अनुपात में अपनी संतुलनकारी भूमिका से पीछे हटने या किसी एक के पक्ष में खड़े होकर असंतुलन बढ़ाने की प्रवृत्ति भी शासक वर्ग में बढ़ रही है। आतंकवाद का कारण, इतिहास, संस्कृति, जनता, जनतांत्रिक संस्थाएँ वित्तीय जनतंत्र, वृद्धि और विकास, मानवाधिकारों से जुड़े व्यापक मामलों, पर्यावरण के क्षरण, विस्थापन और पुनर्वास सहित कई प्रसंग हैं जहाँ नागरिक जमात की बड़ी भूमिका है। किसी भी अर्थ में, सिर्फ चुनावी या सत्ता-संघटन की प्रक्रियाओं से जुड़े मुद्दे तक नागरिक जमात की भूमिका को सीमित मान लेना युक्तिसंगत नहीं है। 

रविवार, 15 फ़रवरी 2015

साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन


मनुष्य के आचरण की एकात्मकता के मूलाधार की तलाश


जड़ चेतन गुण-दोष मय विश्वकीन्ह करतार।
संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि वारि विकार।

  

अंगरेजी के कवि मैथ्यू आर्नोल्ड ने 1848 में साहित्य के तुलनात्मक अध्ययन के महत्त्व का संकेत किया था। 1848 के परिप्रेक्ष्य को ध्यान से समझना होगा। माइक रेपोट (1848: Year of Revolution. By Mike Rapport. New York: Basic Books, 2009.) ने रेखांकित किया है कि 19वीं सदी में हुई युरोप की दो बड़ी क्रांतियों, औद्योगिक क्रांति और फ्राँसिसी क्रांति का, सूत्र 1848 से जुड़ता है। इन क्रांतियों से ऊपजी परिस्थितियों ने युरोप के लोगों को दो बुनियादी चुनौती को समझने तथा बरतने के लिए अनुप्रेरित किया। एक चुनौती थी समानता और राष्ट्रवाद की अवधारणा से परिचिति से उत्पन्न मूल्यबोध से संपन्न नागरिक जमात से शासन का सलूक और इसी से जुड़ी दूसरी चुनौती यह कि तेजी से घटित हो रहे औद्योगिकीकरण के साथ उतनी ही तेजी से बढ़ती हुई असमानता के दुष्प्रभाव से समाज को कैसे बचाया जाये। हालाँकि 1848 के आंदोलनों और नई हलचलों का कोई बहुत अधिक तात्कालिक प्रभाव न पड़ा तथापि मध्यवर्ग और मेहनतकश जनता का सार्वजनिक जीवन की राजनीतिक-सामाजिक भागीदारी में महत्त्व जरूर बढ़ गया। कम्युनिस्ट लीग के राजनीतिक कार्यक्रम के संदर्भ में कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंजिल्स ने मूलतः जर्मन भाषा में कम्युनिस्ट घोषणा पत्र जारी किया। 1848 में प्रस्तुत कम्युनिस्ट घोषणा पत्र बहुत ही महत्त्वपूर्ण राजनीतिक दस्तावेज माना जाता है। यही वह समय था जब, भारत समेत पूरी दुनिया में यह औपनिवेशिक शक्ति के चंगुल से मुक्ति के लिए कसमसाहट बढ़ रही थी। भारतीय उपमहाद्वीप में 1857 के गदर का महत्त्व है। एसियाटिक सोसाइटी के अध्ययनों की मूल प्रेरणा के रूप में भी इस समय के हलचलों के महत्त्व को ध्यान में रखा जा सकता है। फ्राँसिसी क्रांति के लक्ष्यों में शामिल समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व समेत जेंडर प्रसंग को ध्यान में रखा जा सकता है। रूसी क्रांति के विश्व-व्यापी प्रभाव को समझा जा सकता है। 1857 की क्रांति के संदर्भ को जानने के क्रम में एक निष्कर्ष यह निकाला गया कि भारत को समझ नहीं पाने के कारण वह घटित हुआ। तात्पर्य यह कि भिन्न परिप्रेक्ष्य को समझे जाने की जरूरत महसूस हुई। आज सभ्यताओं के संघात का सवाल पूरी दुनिया में नये सिरे से उठ खड़ा हुआ है। इस माहौल में, जरूरी है कि भिन्न सभ्यताओं को एक दूसरे के परिप्रेक्ष्य से जानने की सतर्क कोशिश की जाये। ऐसे में, अंगरेजी के कवि मैथ्यू आर्नोल्ड ने 1848 में साहित्य के तुलनात्मक अध्ययन के जिस महत्त्व का संकेत किया था, वह पहले से भी अधिक प्रासंगिक हो गया है। 

साहित्य के तुलनात्मक अध्ययन का तात्पर्य

मनुष्य के व्यवहार का अधिकांश उसके संवेगों पर निर्भर करता है। संवेगों का गहरा संबंध उपलब्ध सार्वजनिक भौतिक परिस्थितियों में वैयक्तिक स्थितियों से होता है। कहना न होगा कि सार्वजनिक भौतिक परिस्थितियों में व्यापक रूप से पर्यावरण का मिजाज वैयक्तिक स्थितियों में रोजी-रोजगार की उपलब्धता, आर्थिकी, वैज्ञानिक-तकनीकी संसाधनों तक पहुँच एवं उनके व्यवहार की क्षमता और अंतर्वैयक्तिक संबंधों, सामाजिक अवसरों, परंपराओं एवं प्रचलनों में भागीदारी से तय होता है। साहित्य में विभिन्न परिस्थितियों में मनुष्य के संवेग जन्य व्यवहार के अधिकांश का संयोजन होता है। भिन्न सभ्यताओं को एक दूसरे के परिप्रेक्ष्य से जानने की सतर्क कोशिश के संदर्भ में साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन भाव-साक्षी के रूप में अति महत्त्वपूर्ण उपादान हो सकता है। मनुष्य समुदाय में रहता है, समाज में विचरता है और राष्ट्र में जीता है। समुदाय, समाज और राष्ट्र के अंतस्संबंधों की बारीकियाँ अपनी जगह यह भी याद रखना जरूरी है कि वैश्विक परिस्थितियाँ, पहले की तुलना में आज कहीं अधिक हमें प्रभावित करती हैं। संवाद और तुलना सतत जारी रहनेवाली मानसिक प्रक्रिया है। हम जाने-अनजाने अपने संपर्क में आनेवाले सभी पद और पदार्थ से संवाद कर रहे होते हैं। इस संवाद में प्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष रूप से तुलना भी शामिल रहती है। कहना न होगा कि समुदाय, समाज और राष्ट्र के अंतस्संबंधों की बारीकियों के साथ वैश्विक परिस्थितियों की समझ भी जरूरी है, हाँ यह स्वीकार करना ही होगा कि इस परिस्थिति में, हमारे सहजीवन के लिए राष्ट्रबोध भी नये सिरे से जरूरी हो गया है। अपने एक राष्ट्र होने के भावुक भ्रम (Emotional Illusion) से बाहर निकलने का साहस करते हुए सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक दृष्टि से एक राष्ट्र बनने के लिए साहित्य के समाजशास्त्र के विकास की संभावनाएँ तलाशी जा सकती हैं। इसके लिए साहित्य के समाजशास्त्र में संवेदनात्मक प्रज्ञा (Emotional Intelligence) और संवेदनात्मक दक्षता (Emotional Competence) को प्रभावी ढंग से समायोजित करने की प्रविधि विकसित की जा सकती है। साहित्य में इनकी खोज नये सिरे से की जा सकती है। समायोजन की यह प्रविधि राष्ट्रबोध से संपन्न और वैश्विक परिस्थितियों से संयुक्त करने के लिए जरूरी है। तो संक्षेप में, साहित्य के तुलनात्मक अध्ययन का तात्पर्य है मनुष्य के मूलतः एक होने और विभिन्न परिस्थियों में मनुष्य के आचरण की एकात्मकता के मूलाधार की तलाश।

साहित्य के तुलनात्मक अध्ययन का सलीका

साहित्य के तुलनात्मक अध्ययन में यह जानना अधिक महत्त्वपूर्ण है कि तुल्यों के बीच जो महत्त्वपूर्ण है वह कैसे महत्त्वपूर्ण है, न कि यह जानना कि क्या महत्त्वपूर्ण है। दुहराव के जोखिम पर भी यह ध्यान दिलाना जरूरी है कि साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन मूलतः महत्त्वपूर्ण का नहीं महत्त्वपूर्णता के कारणों की तलाश के नजरिये से संचालित होता है। इसके लिए, संस्कृति, राजनीति, समाज, भिन्न चित्र, फिल्म, संगीत आदि कला माध्यमों के साथ-साथ अभिव्यक्ति के विशिष्ट रूपों की अभिव्यक्ति-प्रक्रियाओं की समझ और विभिन्न ज्ञान शाखाओं से अंतर-अनुशासनिक (Inter Disciplinary) और अंतरानुशासनिक (Intra Disciplinary) संवाद और संतुलन जरूरी होता है। सामाजिक संघात से बचाव के लिए संतुलन के साथ मध्यम-मार्ग पर चलना, सहअस्त्वि के लिए सहिष्णुता को निरंतर अर्जित करते रहना और हर हाल में उदात्त-दृष्टिकोण को कारगर बनाये रखना भारतीयता का सारभूत लक्षण है। यह मध्यम-मार्ग, यह संतुलन क्या होता है? इसे कई प्रकार से समझा जा सकता है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का ‘समीक्षा में संतुलित दृष्टि’पर एक लेख है जो उनके ‘विचार और वितर्क’ नामक संग्रह में संकलित है। इस लेख में वे कहते हैं ▬▬▬ ‘मेरा मत है कि संतुलित दृष्टि वह नहीं है जो अतिवादिताओं के बीच मध्य मार्ग खोजती फिरती है, बल्कि वह है जो अतिवादियों की आवेग-तरल विचारधारा का शिकार नहीं हो जाती और किसी पक्ष के उस मूल तथ्य को पकड़ सकती है जिस पर बहुत बल देने और अन्य पक्षों की उपेक्षा करने के कारण उक्त अतिवादी दृष्टि का प्रभाव बढ़ा है। संतुलित दृष्टि सत्यानवेषी दृष्टि है। एक ओर जहाँ वह सत्य की समग्र मूर्त्ति को देखने का प्रयास करती है, वहीं दूसरी ओर वह सदा अपने को सुधारने और शुद्ध करने को प्रस्तुत रहती है। वह सभी प्रकार के दुराग्रह और पूर्वग्रह से मुक्त रहने की और सब तरह के सही विचारों को ग्रहण करने की दृष्टि है।’ 

तुल्यों के बीच परिप्रेक्ष्य के साझेपन की तलाश 

हिंदी के महत्त्वपूर्ण कवि रहीम ने लक्षित किया था ▬▬ कदली सीप भुजंग मुख, स्‍वाति एक गुन तीन। जैसी संगति बैठिए, तैसो ही फल दीन। संगति की महिमा को तुलसीदास ने भी लक्षित किया था ▬▬ मज्जन फल पेखिय ततकाला काक होहिं पिक बकौ मराला। सुनि आचरज करे जनि कोई सत संगति महिमा नहीं गोई। साहित्य के तुलनात्मक अध्यय्न के लिए जरूरी है परिप्रेक्ष्य अर्थात भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में साहित्य के थीम के बनने और भिन्न-भिन्न साहित्य में व्यवहृत उस थीम में साझेपन की तलाश। थीम के बनाव पर ध्यान दें तो, धर्म, ईश्वर, सेक्स, प्रेम, समाज, आर्थिकी, व्यक्ति, षड़यंत्र, साहित्य, संस्कृति, मुक्ति साहित्य के स्थाई थीम रहे हैं। इनका विकास समय-समय पर विभिन्न रूप में प्रकट होता रहा है। जैसे, भक्ति आंदोलन, प्रगतिशील आंदोलन, छयावाद की थीम पर विचार किया जा सकता है। नाना निगमागम, बौद्ध प्रसंग, गाँधीवाद, मर्क्सवाद, देशविभाजन, औपनिवेशिक वातावरण, जनतंत्र, रष्ट्रवाद, भूमंडलीकरण और स्थानीयकरण, आबादी की गत्यात्मकता, आब्रजनन, प्रव्रजनन, पुनर्वास, रोजी-रोजगार, विभिन्न अवसर, जीवन के जो चार पुरुषार्थ हैं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष तथा पितृ ऋण, देव ऋण, ऋषि ऋण तथा ऋणबोध आदि की आनुपातिक भिन्नता के सहज स्वाभाविक से नाना थीम बनते रहते हैं। साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन साहित्य के थीम निर्माण और उसके विनियोग की प्रक्रिया के नैपथ्य का गहराई से अध्ययन करता है; संवेदना की बहुस्तरीयताओं की समझ हासिल करते हुए, फिर कहें तो, मनुष्य के मूलतः एक होने और विभिन्न परिस्थियों में मनुष्य के आचरण की एकात्मकता के मूलाधार की तलाश करता है।

जाहिर है, साहित्य के तुलनात्मक अध्ययन के लिए एक से अधिक भाषा, भाषिक सामाजिकता, सामाजिक प्रचलनों, सांस्कृतिक भाव प्रवाहों की ऐतिहासिकताओं के विभिन्न चरणों, राज्य संरचनाओं आदि का गहन ज्ञान जरूरी होता है। स्वभावतः यह अध्ययन स्वायत्त सांस्थानिक सहयोग और दीर्घकालिक समर्थन की अपेक्षा रखता है। साथ ही इस अध्ययन के लिए व्यापक तौर पर एक ऐसी भाषा की स्वीकृति की भी जरूरत होती है जिसमें किये गये तुलनात्मक अध्ययन को व्यक्त किया जा सके ताकि दो तुल्यों के संदर्भ को उन से जुड़े लोग समझ सकें। उदाहरण के लिए तमिल और हिंदी साहित्य के किसी संदर्भ का तुलनात्मक अध्ययन किया जाये तो यह तय करना महत्त्वपूर्ण होगा कि उस अध्ययन को किस भाषा में प्रस्तुत किया जाये? यदि इसे हिंदी में रखा जाता है तो बहुत संभव है कि तमिल से जुड़े लोग की पहुँच इस तक न बने या तमिल में रखें तो हिंदी से जुड़े लोग की पहुँच से यह बाहर रह जाये, अंगरेजी में रखें तो हो सकता है कि हिंदी और तमिल दोनों से जुड़े लोग की पहुँच से यह बाहर रहे और अंगरेजी से जुड़े लोग जो इस अध्ययन तक आसानी से पहुँच बना सकते हैं उन्हें हिंदी और तमिल संदर्भों का ज्ञान ही न हो! तात्पर्य यह कि साहित्य के तुलनात्मक अध्ययन के लिए भाषा का सवाल बहुत महत्तवपूर्ण और संवेदनशील है, खासकर तब जब ऐसे अध्ययन के अकादमिक दुनिया से बाहर पहुँचने की जरूरत को ध्यान में रखा जाये। ऐसे में अनुवाद का महत्त्व समझ में आता है। तुल्यों के अनुवाद के एक भाषा में उपलब्ध होने तथा उनके तुलनात्मक अध्ययन के अनुवाद का दोनों भाषा में उपलब्ध होने की आवश्यकता समझ में आती है। अनुवाद की प्रामाणिकता और गुणवत्ता पर अलग से कुछ कहे बिना भी उसके महत्त्व को समझा जा सकता है।

आज के समय में साहित्य के तुलनात्मक अद्ययन का महत्त्व पहले से कहीं अधिक है। क्योंकि यह सभ्यता और इस सभ्यता की नाना अभिव्यक्तियाँ मनुष्य और मनुष्य की एकता का ही प्रसंग रचते हैं। मनुष्य और मनुष्य के बीच के संघात को कम करने, रोकने और एक बेहतर तथा अधिक जीवंत साझी संस्कृति के लिए साहित्य के तुलनात्मक अध्ययन की प्रासंगिकता न सिर्फ महत्त्वपूर्ण है, बल्कि अपरिहार्य भी है। तुलनात्मक साहित्य के अध्येता को हंस गुण से समृद्ध होना चाहिए, इतना कुशल कि वह दूध और पानी में न सिर्फ अंतर कर सके बल्कि उनमें निहित गुणों की एकता का महत्त्व भी स्थापित कर सकें। 


शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2014

हौसले का हुलास

बहुत ज्यादा शोर मचाये बिना अपना काम करनेवालों के लिए 
कैलास सत्यार्थी को नोबेल पुरस्कार मिलना हौसले का हुलास है
▬▬▬♥♥♥
साल याद नहीं। शायद 1991। कटिंग क्या, किताब भी सम्हाल कर रखने का शऊर नहीं है। लेकिन एक बात याद है। रुरल रिपोर्टिंग के लिए स्टेटमैन अखबार की तरफ से साालाना पुरस्कार दिये जाने का रिवाज रहा है। इस अवसर पर आयोजित डिवेट भी कोलकाता के बुद्धिजीवियों की दिलचस्पी का हिस्सा रहा है। उस साल डिवेट में भाग लेने के लिए आमंत्रित थे ▬ माधव राव सिंधिया,  गोविंदाचार्य और  शाहबुद्दीन। उस साल रुरल रिपोर्टिंग के लिए स्टेटमैन अखबार की तरफ से साालाना पुरस्कार मिला था अदीति कपूर को। उनकी रिपोर्टिंग भदोही के कालीन कारोबार में लगे बंधुआ बाल मजदूर की मुक्ति के लिए किये गये एक अभियान से संबंधित थी। अपने मित्र विजय शर्मा को सौजन्य से अदीति कपूर से बात करने का अवसर मिला था। उन्होंने इस अभियान के संदर्भ में बात करते हुए स्वामी अग्निवेश और कैलास सत्यार्थी की चर्चा की थी। तब जनसत्ता के कोलकाता संस्करण से जुड़े अरविंद चतुर्वेद (Chaturved Arvind) रविवारीय पुस्तिका 'सबरंग' के संपादन का काम देखते थे। उन्होंने अदीति कपूर के साथ हुई बात को आग्रहपूर्वक  'सबरंग' में छापा था।

आज जब कैलास सत्यार्थी को नोबेल पुरस्कार मिला है, तो स्वाभाविक रूप से उस घटना की याद आ गई। सच है, कैलासजी को कम ही लोग जानते होंगे। अभी मंगल की कक्षा में 'भारत का रथ' पहुँचा है उसे तैयार करनेवाले अपने वैज्ञानिकों को जाननेवाले कितने हैं! हम क्रिकेट, राजनीति, फिल्म, मीडिया, कुछ हद तक साहित्य आदि से जुड़े लोगों के अलावे और किसे कितना जानते हैं...! कैलासजी को कम ही लोग जानते हैं यह दुखद भी है और सुखद भी। दुखद यह कि हम समाज हित के कार्य में लगे लोगों को कितना कम जानते हैं! सुखद यह कि बहुत ज्यादा शोर मचाये बिना अपना काम करनेवालों के काम को भी, यदा-कदा ही सही, महत्त्व मिल जाता है। बहुत ज्यादा शोर मचाये बिना अपना काम करनेवालों के लिए कैलास सत्यार्थी को नोबेल पुरस्कार मिलना हौसले का हुलास है। बधाई, नोबेल लॉरिएट कैलास सत्यार्थी को बहुत-बहुत बधाई!

अभी-अभी अमरीका में भारत की जिन तीन महत्त्वपूर्ण का उल्लेख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया है, उन में से एक है भारत की युवा शक्ति। जिस देश के बचपन का अधिकांश भूखा हो उस देश के यौवन के अधिकांश में समाज सार्थक हौसले के हुलास की संभावना बहुत कम होती है। ऐसे में 'बचपन बचाओ' जैसे अभियान का क्या महत्त्व होता है उसका हम सिर्फ अनुमान लगा सकते हैं!  'बचपन बचाओ' जैसे अभियान का क्या महत्त्व उस युवा को मालूम हो सकता है जिसका बचपन बंधक रहा हो, जो बंधुआ बाल मजदूर होने की नियति के आसपास रहा हो। समाज कैलास सत्यार्थी को चाहे जितना कम या ज्यादा जाने लेकिन महत्त्वपूर्ण यह है कि समाज बचपन को बचाते हुए उसे समाज सार्थक युवा में बदलने का अवसर देने के महत्त्व को पहचाने। नये भारत के निर्माण का रास्ता बचपन को इस तरह से बचाने के अभियान के महत्त्व को आत्मसात करने के बीच से ही निकलता है। इतना उपद्रवग्रस्त है हमारा अंतःकरण कि  बचपन को इस तरह से बचाने के अभियान के महत्त्व को आत्मसात करना बहुत आसान नहीं है। इस कठिन घड़ी में यह उम्मीद का एक और आकाश है, यह रास्ते के संधान की एक और संभावना है। विकास की यह नई जमीन का अर्थपूर्ण संकेत है। याद कीजिये बुधिया को। बुधिया यानी युग-युग धावित यात्री को। 

राजीव गाँधी प्रधानमंत्री थे। 1987 में आजादी के चालीस साल का जश्न का माहौल था। तब एक कविता लिखी थी ▬▬ आज भी जब छोटे-छोटे बच्चों को माँजते हुए चाय की प्याली देखता हूँ, देश का भविष्य औंधी हुई कड़ाही की तरह लगता है। इसे नुक्कड़ नाटक के समय कोलकाता के साथियों के साथ पढ़ा जाता था।  जो लोग उन्नत भारत की बात करते हैं उन्हें जब ऐसे बच्चे दिखें तो थोड़ी देर के लिए ही सही पर सहम जाना चाहिए, जिन बच्चों के बचपन को बचपन को बचाने के काम में कैलास सत्यार्थी और उनके साथी लगे हैं। कविता लिखने का यह भी एक तरीका है, शायद अधिक कारगर तरीका। 

बुधवार, 8 अक्टूबर 2014

जनता का लेखक!

कवि विमल कुमार (Vimal Kumar) जी की एक प्रविष्टि पढ़ने के बाद

जनता का लेखक! किस जनता का! हिंदी के महत्त्वपूर्ण लेखकों के अपने कुछ पाठक तो हैं लेकिन जनता (सार्त्र जिसे पब्लिक कहते हैं) नहीं है। मुक्तिबोध को सार्त्र प्रिय थे और अकारण नहीं है कि मुक्तिबोध 'जनता का लेखक' और 'जनता का साहित्य' की बात को अपने अंतःकरण की गहराई से उठाते थे। मुक्तिबोध बहुत ही बेचैन लेखक थे। प्रसंगवश, मुक्तिबोध अपनी रचना का कठोर संपादन तो करते ही थे कतर-ब्यौंत भी कम नहीं करते थे। रचना न एक ही तरह से कभी संभव होती है और न उसका शिल्प ही एक तरह से बनता है। महत्त्वपूर्ण लेखक का लेखन धरती की तरह होता है, इसमें पहाड़ भी होते हैं, सपाट मैदान भी, नदी, द्वीप तालाब आदि भी होते हैं। इतना ही नहीं लेखन की इस धरती पर संभव हुए पहाड़ में अजंता, एलोरा, खजुराहो और कहीं-कहीं ताजमहल और लालकिला आदि भी होते हैं ▬▬ धीरे बहो दोन रे! 
(धीरे बहो दोन रे - मिखाइल सोलोखोव)



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Suresh Upadhyay, अमनदीप सिँह, Sanjay Binnani और 12 अन्य को यह पसंद है.


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Vinay Krishna Kalakar to wo he hai jo puruskar ko aswikar kar de
कल 09:16 पूर्वाह्न बजे · पसंद


Noor Mohammad Noor Pahle koyee dene ki ghosna to kre phir oose asweekar karte kitni der lgegi.....sathi...
कल 10:18 पूर्वाह्न बजे · पसंद


Vinay Krishna Ji, aapne thik kaha.mai Bihar ke vaishali zila ke Hajipur me rahata hu.maine yaha dekha hai ke kuchh kavi aur sahityakar aise hai jo sanstha ko dhan-rashi dekar santha dwara khud ko sammanit karbaya.sanstha ke log bhi kuchh rashi hadap kar gaya,tatha newspa[per me mote akshar me kavi aur sahityakar ko sanstha dwara sammanit kiya gaya.
22 घंटे · नापसंद · 1


Noor Mohammad Noor Bhai vinaijee....hajipur se dilli tak yhi tmasha hota hai....
21 घंटे · पसंद · 1

शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

जनतांत्रिक गुणवत्ता और संरचना सुधार

भारत में कभी पंचायत, कभी पौर सभा, कभी नगरनिगम, कभी विधान परिषद, कभी विधान सभा, कभी राज्य सभा, तो कभी लोक सभा जैसी विभिन्न स्तर की जनतांत्रिक संस्थाओं के चुनाव होते ही रहते हैं। चुनावों के दौरान भारी अफरा-तफरी मचती है। नागरिक जीवन बुरी तरह प्रभावित होता है। खासकर लोकसभा के चुनाव के समय। चुनाव के ड्यूटी पर लगनवाले कर्मचारी से लेकर सुरक्षा बलों तक हर कोई परेशान हाल रहता है। सार्वजनिक परिवहन पर तो इसका ठप्पकारी असर पड़ता है। राजकोष पर खर्च का बोझ भी एक साथ बढ़ जाता है। आदर्श आचार संहिता लागू होने पर कई जरूरी कदम उठाने से भी सरकार हिचक जाती है। कई बार आदर्श आचार संहिता की ओट में सरकार जरूरी कदम उठाने में अपने को लाचार बताती है। दूसरा पहलू यह है कि लोकलुभावन वायदों की बहार आ जाती है, एक-से-बढ़कर-एक वायदे किये जाते हैं। इनमें से अधिकतर वायदे अव्यावहारिक होते हैं। अव्यावहारिक वायदों को पूरा करने की दिशा में कोशिश की तो बात ही क्या, निहायत व्यावहारिक किस्म के अधिकतर वायदों पर भी सत्ताधारी दल ध्यान नहीं देता है। जनप्रतिनिधियों पर जनता की पकड़ बिल्कुल ही ढीली पड़ जाती है। 

चुनाव किसी भी जनतांत्रिक व्यवस्था में प्राण के संचार का आधार होता है। लेकिन चुनाव के बाद जनता, अक्सर अपने को ठगा-सा महसूस करने लगती है। ऐसे में चुनाव सुधार के विभिन्न प्रकारों पर विचार-विमर्श भी होता रहता है। नागरिक जमात की ओर से बार-बार चुनाव सुधार की माँग उठती रहती है। नागरिक जमात ही क्यों खुद चुनाव आयोग और उच्चतम न्यायालय भी चुनाव सुधार की जरूरत को अपने तरीके से रेखांकित करता रहा है। इसमें आपराधिक मामलों में लिप्त और कानून की गिरफ्त में फँसे लोगों के निर्वाचन प्रार्थी बनने पर पाबंदी, निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने तथा खारिज किये जाने की भी माँग शामिल रही है। राजकोष से उम्मीदवारों के चुनावी खर्च की प्रतिपूर्त्ति, चुनाव संबंधित चंदा सार्वजनिक रूप से ही दिये जाने आदि के प्रवधानों को लागू करने की भी माँग रही है। कुल मिलाकर यह कि जनतंत्र के सही ढंग से काम करते रहने के लिए चुनाव सुधार की जरूरत बहुत तेजी से महसूस की जा रही है। 

भारत का संघीय ढाँचा द्विसदनीय है ▬▬ लोक सभा और राज्य सभा। हालाँकि, सभी राज्यों में द्विसदनीय व्यवस्था नहीं है, अर्थात कुछ राज्यों में सिर्फ विधान सभा की व्यवस्था है, विधान परिषद का कोई प्रावधान नहीं है। वित्त विधेयकों को अपवाद माना जाये तो राज्य सभा का सभी विधायी कारोबार में समान महत्त्व है। फिर भी, सरकार के गठन में लोक सभा के सदस्यों की ही भूमिका होती है। लकसभा के कम-से-कम पचास प्रतिशत सदस्यों को समर्थन हासिल करनेवाला या महामहिम राष्ट्रपति को पचास प्रतिशत सदस्यों को समर्थन हासिल करने का विश्वास दिलानेवाला व्यक्ति ही प्रधानमंत्री पद का उपयुक्त दावेदार होता है। हालाँकि प्रधानमंत्री सहित कोई भी मंत्री अनिवार्यतः लोकसभा का ही सदस्य हो यह संवैधानिक रूप से जरूरी नहीं है। बहुमत का फैसला सदन में ही होता है। यानी संघ सरकार के गठन में राज्य सभा की कोई भूमिका नहीं होती है, लेकिन विधायी कारोबार में उसका समान महत्त्व होता है। राज्य सभा में बहुमत के समर्थन का भरोसा नहीं रहने पर कभी-कभी सरकार को परेशानी का सामना करना पड़ता है, हाथ बँधे होने का एहसास होता है। राज्य सभा में बहुमत का समाँ धीरे-धीरे बदलता है और इस बदलाव में कोई बड़ा झटका नहीं लगता है।

राज्य सभा स्थाई सदन है। राज्य सभा कभी विघटित नहीं होती है। प्रत्येक दो साल पर दो तिहाई सदस्य राज्य सभा की सदस्यता से मुक्त होते हैं और उतने ही नये सिरे से चुनकर आते हैं। लोकसभा सभा स्थाई सदन नहीं है। यह पाँच साल में विघटित हो जाती है और फिर आम चुनाव के बाद नये सिरे गठित होती है। इससे लोक सभा में बहुमत का समाँ हठात बदलता है और यह बदलाव बड़ा झटका देता है। इस झटके को जनता और जनता पर लागू करनेवाली नौकरशाही दोनों ही ठीक से बर्दाश्त नहीं कर पाती हैं। बीच में ही सरकार की नीतिगत प्राथमिकताओं में प्रतिमुखी बदलावों, नई योजनाओं के संदर्भ में सरकारी की नीतियों में होनेवाले बदलाव का भी कई बार अच्छा असर नहीं पड़ता है।

दुहराव के जोखिम पर एक बार फिर याद कर लेना प्रासंगिक है, प्रधानमंत्री सहित कोई भी मंत्री राज्य सभा का, अर्थात स्थाई सदन का, सदस्य हो सकता है। ऐसे में दो प्रस्तावों पर विचार किया जा सकता है▬▬
1.  लोक सभा को भी राज्य सभा के ढव (पैटर्न) पर स्थाई सदन में बदल दिया जा सकता है।
2.  सरकार गठन के लिए बहुमत के निर्धारण में राज्य सभा के सदस्यों की बराबर की भूमिका सुनिश्चित किये  जाने पर विचार किया जा सकता है।  
3.  इन दोनों प्रस्तावों को एक साथ लागू करने की संभावनाओं पर भी सोचा जा सकता है।


हालाँकि, इन प्रस्तावों की संवैधानिक स्थिति या बुनियादी ढाँचे से संबंधित हने, न होने के बारे में संविधान विशेषज्ञ, वृहत्तर नागरिक जमात, सरकार, सदन और उच्चतम न्यायालय विचार कर कोई रास्ता सुझा सकते हैं। जनतांत्रिक गुणवत्ता के लिए संरचना में सुधार की संभावाओं को गहराई से टटोलना समय की बड़ी जरूरत है। 

मंगलवार, 2 सितंबर 2014

अहिंसा और वैचारिक विसंगतियाँ

यह भारत के लिए गौरव की बात है कि राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के जन्मदिन 02 अक्तूबर को संयुक्त राष्ट्र की तरफ से विश्व अहिंसा दिवस के रूप में मान्यता दी गई है। विश्व शांति और अहिंसा की बात करनेवाले एक से एक दार्शनिक, कवि, साधू, महात्मा, धर्मात्मा हुए हैं। फिर महात्मा गाँधी में आखिर ऐसी क्या बात है जिस से 02 को विश्व अहिंसा दिवस के रूप में मनाने का औचित्य पुष्ट होता है। 'अहिंसा की नीति के जरिए विश्व भर में शांति के संदेश को बढ़ावा देने के महात्मा गांधी के योगदान को सराहने के लिए इस दिन को अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में मनाने का फ़ैसला किया गया था।' इस योगदान को समझना जरूरी है। महात्मा गाँधी की खासियत यह थी कि उनका अहिंसा दर्शन अपने व्यवहार में आम आदमी की जीवनचर्या से जुड़कर जीवन आदर्श बन जाने की तरफ बढ़ता है। यह पूरी सभ्यता हिंसा पर टिकी है। ऐसा माना जाता है कि मनुष्य प्राकृतिक रूप से हिंसक प्राणी है। सांस्कृतिक रूप से उसे अहिंसा की तरफ बढ़ना है। संस्कृति के निर्माण में राजनीति की बड़ी भूमिका होती है। क्योंकि जीवन की भौतिक जरूरतों को पूरा करने की व्यवस्था राजनीति का दायित्व है। भौतिक जरूरत को पूरा किये बिना कोई संस्कृति बन नहीं सकती। महात्मा गाँधी के पहले और उनके अलावे जितने भी दार्शनिक, कवि, साधू, महात्मा, धर्मात्मा हुए हैं लगभग सभी विचार और आकांक्षा के आध्यात्मिक सरीखे क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। क्योंकि वह राज्य और धर्म की परस्पराश्रयिता के सक्रिय संबंध का समय था।

महात्मा गाँधी जब सत्य अहिंसा की बात के साथ राजनीतिक पटल पर प्रकट होते हैं उस समय दुनिया की सभ्यता चारित्रिक रूप से बदल रही थी। पहले औद्योगिक क्रांति के बाद विश्व नये रूप में उभर रहा था। उत्पादन के साधन में बदलाव आने के साथ विश्व की भौतिक जरूरत बदल और बढ़ रही थी। पहले राज्य और धर्म का परस्पराश्रयी संबंध था। अब यह परस्पराश्रयिता बदल रही थी। औद्योगिक क्रांति के साथ, राष्ट्रवाद के मार्फत राज्य और पूँजी के बीच 'पवित्र' परस्पराश्रयिता का संबंध विकसित हो रहा था। व्यापारिक प्रतिस्पर्द्धा के अंदर विश्व टकराव के बीज विकसित हो रहे थे। राज्यों की सामरिक क्षमता और युद्ध के प्रभाव की व्यापकता में भारी वृद्धि हो रही थी। अब यह नहीं हो सकता था कि एक तरफ मैदान में किसान हल चला रहे हों और दूसरी तरफ सैनिक युद्ध कर रहे हों। धर्मनिरपेक्षता नये सिरे से प्रासंगिक हो रही थी, क्योंकि धर्म को राज्य से विलग होकर पूँजी के लिए स्थान छोड़ना था। ऐसे में महात्मा गाँधी ने सत्य अहिंसा की बात को धर्म क्षेत्र से थोड़ा बाहर निकलकर लेकिन धार्मिक आवरण का इस्तेमाल करते हुए राजनीति के क्षेत्र में लागू किया। चूँकि औपनिवेशिक सत्ता से मुक्ति की राजनीति में गाँधी सत्य-अहिंसा का विनियोग कर रहे थे इसलिए विश्व राजनीति के संदर्भ तथा अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के संतुलन को बनाये रखने में इस का महत्त्व पठनीय है।


2007 तक आते-आते उदारीकरण-भूमंडलीकरण-निजीकरण में निहित आकांक्षाओं के कारण विश्व में नये किस्म के टकराव की ओर बढ़ रहा था। यहाँ गाँधी के राजनीतिक सिद्धांत की व्यावहारिकता में नई चमक को विश्व समुदाय ने देखा-परखा और उनके जन्मदिन 02 अक्तूबर को विश्व अहिंसा दिवस के रूप में मानने के औचित्य को समझा। भारत को इस बात पर गर्व करना चाहिए, लेकिन गर्व करना ही काफी नहीं है, बल्कि इसे समझना चाहिए। इसे समझते हुए मुगालते में पड़ने से भी बचना चाहिए। स्वीकार करना चाहिए कि भारत में 'वसुधैव कुटुंबकम' जैसी कोई भावना कभी उस तरह से जीवंत और सक्रिय नहीं रही है। आंतरिक कोलाहल, अपनों को पराया बनाये जाने, सामाजिक भेद-भाव, आर्थिक शोषण के बढ़ते दबाव के इस दौर में इस बात में उक्ति मनोहरता चाहे जितनी हो इसका वास्तविक मूल्य नकारात्मक ही है। इस बात को ध्यान से सुनना चाहिए जो प्रधानमंत्री ने कहा। कहा कि अहिंसा के लिए भारत की पूर्ण प्रतिबद्धता है और यह 'भारतीय समाज के डीएनए में रची बसी है तथा यह किसी भी अंतरराष्ट्रीय संधि से बहुत उपर है।' उनका संदर्भ भारत के परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर करने से इनकार की ओर था। इस बात के अन्य आयाम हैं, लेकिन खुद जापान की जमीन पर खड़े होकर ऐसा कहने का मतलब कुछ और भी है। अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर करने से भारत के इनकार के कारणों तथा इस अंतर्राष्ट्रीय संधि प्रस्ताव की वास्तविक खामियों का उल्लेख करते हुए उन खामियों को दूर किये जाने के अंतर्राष्ट्रीय प्रयास की बात करना अधिक उपयुक्त होता। भारतीय समाज के डीएनए की बात का मर्म समझना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है! भारत का डीएनए रिपोर्ट बताने के बदले दुनिया की वास्तविक स्थिति पर बात करना अधिक उपयुक्त है। शांति में सभी फरीकों की भौतिक स्थिति की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती 'किसी एक का डीएनए' ही काफी नहीं होता है। एक और लगातार युयुत्स मुद्रा में रहने, लगातार युद्ध की भाषा बोलने और दूसरी विश्व शांति और अहिंसा के अपने डीएनए में होने की बात में अंतर्निहित आत्म-विरोध को राजनीतिक संगत और आर्थिक सम के व्यवहार पर लाना ही होगा।

05 सितंबर को भारत शिक्षक दिवस के रूप में मनाता है। भारत रत्न से सम्मानित सर्वपल्ली राधाकृष्णन एक आदर्श शिक्षक तो थे ही भारतीय और पाश्चात्य दर्शन में निहित वैश्विक आयामों के सामान्य पक्ष को अधिक दार्शनिक दक्षता के साथ दुनिया के सामने लानेवाले महान व्यक्ति भी थे। आधुनिक काल के जिन थोड़े-से भारतीयों का विश्व बौद्धिक जगत में सम्मान था उनमें राधाकृष्णन का नाम बड़े सम्मान से शामिल है। वे भारत के उपराष्ट्रपति और राष्ट्रपति भी रहे। जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में काम किया लेकिन उन्होंने अपने को शिक्षक के रूप में ही पहचाना। दुनिया के विभिन्न देशों में विभिन्न लोगों के नाम पर शिक्षक दिवस मनाया जाता है। वे अपना जन्म दिन अपने नाम से न मनाकर शिक्षक दिवस के रूप में मनाना चाहते थे। इस दिन को शिक्षक बिरादरी को सम्मानित किये जाने के उद्देश्य से जोड़ना भी उनकी इच्छा थी। उनकी इस पवित्र इच्छा का सम्मान करते हुए पूरा देश उनकी अंगरेजी जन्म तारीख 5 सितम्बर को प्रति वर्ष शिक्षक दिवस के नाम से ही मनाता है। इस संदर्भ में एक बात की तरफ भी ध्यान देना जरूरी है। राधाकृष्णन शिक्षा के स्वरूप को लेकर जो सोचते थे वह बहुत ही महत्त्वपूर्ण था। शिक्षक दिवस के रूप में राधाकृष्णन का जन्म दिन मनाते हुए, हमें देश भर के शिक्षकों का शासकीय और सामाजिक सम्मान तो करना ही चाहिए लेकिन एक शिक्षक के रूप में जो वे सोचते थे उसका भी सम्मान किया जाना जरूरी है। यह सच है कि वे भारत के पहले शिक्षा मंत्री के रूप में भारत सरकार की शिक्षानीति का प्रारंभिक ढाँचा तैयार कर नई शिक्षा प्रणाली को अधिक गतिमय बना सकते थे, यह नहीं हुआ।
वे भारत के पहले शिक्षा मंत्री नहीं बने, लेकिन उनके विचारों का महत्त्व इससे कम नहीं हो जाता है। शिक्षा आयोग के रूप में उनके सुझावों पर ही 1953 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग बना। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का भारतीय शिक्षा में कितना योगदान है, यह रुचि रखनेवाले सभी जानते हैं। आज कहीं-कहीं से भिन्न तरह की आवाज उठ रही है। एक नागरिक डर हमारे अंदर सक्रिय हो रहा है। 05 सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में न मनाया जाकर गुरु दिवस के रूप में मनाये जाने की आवाज। गुरु और शिक्षक में बहुत अंतर है, वैसे ही जैसे शिक्षा और विद्या में बहुत अंतर है। डर यह कि शिक्षक दिवस को गुरु दिवस में बदल दिये जाने के बाद बारी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की आयेगी। योजना आयोग की हालत देख ही रहे हैं।

जिस तरह से भारत की डीएनए रिपोर्ट को बाँचा जा रहा है, उससे डर तो लगता ही है। इसी तरह अचनाक भारत सरकार 02 अक्तूबर को विश्व अहिंसा दिवस के रूप में बनाये जाने के स्वरूप में भी अंदर-अंदर बदलाव करने की योजना बना सकती है। जाहिर है, पूँजी और राज्य के अंतर्ध्वंस से बचाव का जो भी रास्ता बन सकता है, उसमें एक रास्ता गाँधी व्यवहार का भी है। गाँधी व्यवहार के देश भारत में नई सरकार आने के बाद सत्ता समूह में नये मिजाज का प्रभावशाली बनना कोई अचरज की बात नहीं है। इस समय कई जारी प्रसंगों की अंतर्वस्तु में बदलाव लाने का शासकीय प्रभाव जोर पकड़ता दिख रहा है। नया मिजाज जैसा भी हो यह याद रखना जरूरी है कि गाँधी सत्य और अहिंसा की व्यवहार्यता के लिए जिस जीवन-शैली की बात करते थे हम उससे कहीं बहुत दूर जा खड़े हुए हैं। रूपक में कहने की इजाजत हो तो गाँधी रेल के विस्तार के विरोधी थे और आज हमारी कोशिश बूलेट रेल चलाने की है। यह स्वाभाविक आकांक्षा है। अहिंसा को तरह-तरह से परिभाषित कर समझने की कोशिश की गई है। मन, कर्म और वचन के संदर्भ से भी अहिंसा को समझा गया। आज के जिस आक्रामक विकास के दौर से हम गुजर रहे हैं, उसमें संगठित हिंसा के लिए भी बड़ी जगह और एक तरह की मानसिक वैधता की स्वीकृति बनती जा रही है। किसी भी व्यक्ति. समूह या समुदाय के जीवन-स्तर में आत्मिक विकास के अवसर की संभावनाओं को अवरुद्ध नहीं करना ही अहिंसा है। गाँधी जिस परिप्रेक्ष्य में अहिंसा को जरूरी मूल्य के रूप में अपने राजनीतिक व्यवहार में शामिल कर रहे थे उस परिप्रेक्ष्य में एक की वंचना दूसरे के विकास की बुनियादी शर्त्त बनने लगी थी। प्रकृति चक्र में एक जीव दूसरे का भोज्य होता है। कहने में बहुत ही बुरा लग रहा है परंतु प्रकृति चक्र का यह सिद्धांत अपने निकृष्टतम रूप में मानव संस्कृति में और भयानक ढंग से सक्रिय है। सांस्कृतिक रूप से अहिंसा की तरफ बढ़ना बहुत ही मुश्किल हो गया है। संस्कृति के निर्माण में गाँधी व्यवहार जिस राजनीतिक संस्कृति की जरूरत बता रहा था, वह राजनीतिक संस्कृति अंततः चल नहीं पाई। क्योंकि अब राजनीति अर्थनीति से तय होने की दिशा में तेजी से बढ़ गई। आम नागरिक के जीवन की भौतिक जरूरतों को पूरा करने और मुनाफा में संतुलन की व्यवस्था राजनीति का दायित्व हो गया। राजनीति पर अर्थनीति के नियंत्रण का नतीजा यह कि पलड़ा मुनाफा का भारी होता जा रहा है। इस संतुलन का कायम रखने के लिए गाँधी के अहिंसा विचार की खास जरूरत है। असंतुलन सामान्य नागरिक जीवन को ही दुर्भर नहीं बनाता है बल्कि पूँजीवाद को भी दुर्निवार अंतर्ध्वंस की परिस्थितियों में धकेल देता है। इसलिए गाँधी का अहिंसा विचार मनुष्य की परस्पराश्रयी सभ्यता में संतुलन का संदेश है। अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस 02 अक्तूबर का यही संदेश है और इसे इस रूप में पढ़ा जाना चाहिए।

अहिंसा और वैचारिक विसंगतियांः जनसत्ता 

गुरुवार, 28 अगस्त 2014

असंभव नहीं नागरिक जमात के लिए


दुष्चक्र से निकलना मुश्किल तो है, पर असंभव नहीं नागरिक जमात के लिए

सर्वोच्च न्यायलय ने हाल की टिप्पणी में न्यायिक अति सक्रियता से बचते हुए तथा कार्यपालिका की गरिमा के अनुकूल बहुत ही सार्थक एवं संतुलित बात कही है। निश्चित रूप से प्रधामंत्री और मुख्यमंत्रियों के संवैधानिक एवं नैतिक व्यवहार पर भरोसा करना ही चाहिए। ऐसे किसी भी व्यक्ति को मंत्रीमंडल या मंत्रीपरिषद में शामिल नहीं करना चाहिए जो आपराधिक मामलों में संदेह के घेरे में हैं। न्यायिक टिप्पणी में संवैधानिक उम्मीद की बात बहुत ही सफाई से कही है और बाकी सबकुछ को प्रधानमंत्री के विवेक पर छोड़ दिया गया है, इस सावधानी के साथ कि वे न तो 'उससे ज्यादा कुछ' कह रहे हैं न 'उस से कुछ कम' ही कह रहे हैं। इसे बहुत ही गंभीरता से पढ़े जाने की जरूरत है।

उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, जनप्रतिनिधि इस पाठ की ओर ध्यान देंगे। नागरिक समाज के लिए भी इस न्यायिक मंतव्य का पाठ महत्त्वपूर्ण है। सामान्य तौर पर मंत्री बनने की बात तो चुनाव जीतने के बाद उठती है। चुनाव जीतकर जनप्रतिनिधि बनने के पहले आपराधिक पृष्ठभूमिवाले लोग विभिन्न राजनीतिक दलों के अधिकृत उम्मीदवार बनते हैं। राजनीतिक दल कई कारणों से उन्हें अपना अधिकृत उम्मीदवार बनाता है, कई बार न चाहकर भी। जनता का समर्थन पाकर वे जनप्रतिनिधि बनते हैं। इन चुने हुए सांसदों और विधायकों का बहुमत हासिल करने के बाद ही कोई प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बनता है। यहाँ बात ध्यान में रखने की जरूरत है कि किसी सांसद या विधायक को मंत्री बनाना प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार तो है, लेकिन किसी का प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बनना भी तो सांसदों या विधायकों के बहुमत से ही संभव होता है। ऐसा बताया जाता है कि 541 सांसदों में 34 प्रतिशत सांसद आपराधिक पृष्ठभूमिवाले हैं। प्रधानमंत्री बनने के लिए 50 प्रतिशत सांसदों का समर्थन ही काफी होता है। इन 34 प्रतिशत आपराधिक पृष्ठभूमिवाले सांसदों की दलीय संपृक्ति के असर की बारीकियों में न भी जायें तो यह समझना मुश्किल नहीं है कि क्यों कोई प्रधानमंत्री चाहकर भी अकेले इनको दरकिनार नहीं कर सकता। इसी तरह से, समझा जा सकता है कि जब इतने बड़े पैमाने पर अपराध का समाजीकरण हो रहा है तो, राजनीतिक दलों के पास अपने अस्तित्व की रक्षा करने और प्रासंगिकता को बनाने एवं बचाने के लिए आपराधिक पृष्ठभूमिवाले लोगों को स्वीकार करने की क्या मजबूरी है। यही है दुष्चक्र, जिससे बाहर निकलना आसान नहीं है।

दुष्चक्र से बाहर निकला कठिन चाहे जितना भी हो इसे असंभव नहीं माना जा सकता। इस पूरे प्रसंग को चुनाव सुधार की नागरिक प्रक्रिया की नजर से देखना चाहिए, जबकि हम चुनाव सुधार की प्रक्रिया को राजनीतिक प्रक्रिया की दृष्टि से देखने के ही अभ्यासी हैं। यहाँ यह सवाल बहुत महत्त्वपूर्ण है कि क्या हम अपने अभ्यास को बदल नहीं सकते! मेरा ख्याल है बदल सकते हैं। बदलाव की प्रारंभिक जड़ता की परिणतियों की अवरुद्धताओं के सांगोपांग को ध्यान में रखते हुए भी मेरा ख्याल है कि नागरिक जमात हर प्रसंग को राजनीतिक नजरिये से देखने के अपने अभ्यास को बदल सकता है और नागरिक जमात की नजर से परखने का नया अभ्यास प्रारंभ कर सकता है। हालाँकि नागरिक जमात के काम करने के तरीके का हमारा हालिया अनुभव बहुत सुखद नहीं है। भ्रष्टाचार के खिलाफ नागरिक जमात के दबाव का चुनावी राजनीति में निवेश बहुत खतरनाक साबित हुआ। फिर भी प्रयास तो किया ही जा सकता है, क्योंकि इस दुष्चक्र से बाहर निकले का रास्ता नागरिक जमात के वैयक्तिक सोच की सामूहिक गलियों से होकर ही निकलता है। इसके साथ ही कुछ और बातों का ध्यान रखना चाहिए ▬▬ नागरिक जमात न तो रष्ट्रीय जमात होता है और न ही राजनीतिक जमात होता है। राष्ट्रीय होना भी राजनीतिक होना है; बिना राजनीतिक हुए राष्ट्रीय हुआ ही नहीं जा सकता है। नागरिक होना भी राजनीतिक होना है लेकिन दोनों में महत्त्वपूर्ण अंतर है। नागरिक होने का सामाजिक/ सामुदायिक बोध नागरिक को सत्ता की राजनीति के खास संदर्भ में अ-राजनीतिक होने को संभव कर लेता है। जबकि, राष्ट्रीय होना नागरिक होने के सामाजिक/ सामुदायिक बोध को समाप्त नहीं भी तो निष्क्रिय अवश्य ही कर देता है और नागरिक के सत्ता की राजनीति के ही खास संदर्भ में राजनीतिक होने को संभव कर देता है।इस अर्थ में फिर याद करना जरूरी है कि नागरिक जमात न तो रष्ट्रीय जमात होता है और न ही राजनीतिक जमात होता है। हमारे नागरिक जमात के काम करने में ये दोनों ही बात सक्रिय थी ▬▬ इसे राष्ट्रीय जमात के रूप में संगठित करने की लालसा और राजनीतिक जमात में बदल जाने की दुर्बलता से बचाना हमारे लिए संभव नहीं हुआ। 

आगे यदि, नागरिक जमात अपने अनुभव से सीखते हुए समाज-स्थानिक स्तर पर जुटने की कला सीख लेता है और संगठित राजनीतिक जमात में बदल जाने की दुर्बलता से बचने का रास्ता खोज लेता है तो न्यायिक टिप्पणी में जिस संवैधानिक उम्मीद को प्रधानमंत्री के विवेक पर छोड़ दिया गया है, उस संवैधानिक उम्मीद को प्रसन्न किया जा सकता है। जरूरी है कि नागरिक जमात न्यायिक टिप्पणी में उल्लिखित संवैधानिक उम्मीद को नागरिक नजरिये से पढ़े। यह एक नागरिक चिंता है, यही इसकी ताकत भी है और कदाचित सीमा भी। क्या कहते हैं!

सोमवार, 25 अगस्त 2014

जनादेश का राजनीतिक मिजाज और समाज का मन

अभी-अभी कुछ दिन पहले जब भारतीय जनता पार्टी भारी बहुमत से सत्ता में आई तो उसे सुनामी कहा गया। इस सुनामी के तरह-तरह के अर्थ निकाले गये, इसकी तरह-तरह से व्याख्याएँ की गई। उपमाओं और रूपकों में सोचनेवाले हम लोगों ने अच्छे दिन को समझा, सराहा, स्वीकार किया। अपने-अपने तरीके से चकित हुए, कई तरह की आशंकाएँ व्यक्त की। यह सब जनतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है और इसका सम्मान किया ही जाना चाहिए। सबने अपने-अपने ढंग से जनादेश की व्याख्या की। यही जनतंत्र की बड़ी खूबी है। संसदीय राजनीति में चुनावी नतीजों का निहितार्थ राजनीतिक दलों की सुविधा-असुविधा पर ही निर्भर नहीं करता है, लेकिन राजनीतिक दल इसके निहितार्थ को अपनी सुविधा की समझ से प्रकट करते हैं। अपनी जीत को बड़ा कर दिखाना और हार को छोटा कर दिखाना इनकी सुविधा की माँग होती है। चुनावी नतीजों के संकेत को राजनीति अपने ढंग से पढ़ती है, अपने ढंग से व्यक्त करती है। नागरिक समाज को इसे अपने तरीके से पढ़ना चाहिए और अपने ढंग से व्यक्त करना चाहिए। जानादेश का राजनीतिक पाठ ही नागरिक पाठ भी हो, जरूरी तो नहीं!

इतने कम दिन में ही यदि जनता का फैसला कुछ बदला-बदला-सा है तो इसके पीछे जनता के मन की पीड़ा की सक्रियता को समझना चाहिए। यह सही है कि इसे किसी बड़े बदलाव के संकेत के रूप में नहीं देखा जा सकता फिर भी इतना तो तय है कि जनता ने संकेत दे दिया है। दलीय गठबंधन और समीकरण की बात को महत्त्वपूर्ण मानते हुए भी इसके संकेत का नागरिक पाठ यही है कि जनता ने बरसों बाद यदि केंद्र की सत्ता में अखंड बहुमत अखंड जनमत का नतीजा है। इस अखंड जनमत को खंडित कर पढ़ने का प्रयास सत्ताधारी दल न करे। सहज राजनीतिक मन से स्वीकार करना चाहिए कि जनता को प्रतीक्षित और अपेक्षित नतीजा नहीं मिल रहा है, उम्मीद की दिशाएँ भी धुँधली होती जा रही है। यह ठीक है कि इतने कम दिन में सरकार के काम-काज का मुकम्मल लेखा-जोखा करना न तो उचित है न संभव, लेकिन दिशा और दृष्टि का संकेत तो मिल ही सकता है। मँहगाई पर न तो काबू पाया जा सका है, न काबू पाने की किसी ठोस कोशिश का कोई लक्षण दिख रहा है। बजट के विभिन्न प्रावधानों का असंतुलन भी सबके सामने है। भाषा से लेकर हर तरह के सामाजिक उपकरण और अलंकरण के व्यवहार के लक्षण कोई शुभ संकेत नहीं दे रहे हैं। मंत्रियों के गैर जिम्मेवार और कई मामलों में गैर-जरूरी बयानों से भी नागरिक मन परेशान है।

जनतंत्र में सत्ता का औद्धत्य, चाहे सत्ताधारी जमात की विचारधारा जो भी हो, नागरिक मन को बहुत परेशान करता है। धर्मनिरपेक्षता भारतीय संस्कृति का सार है और भारत के संविधान का मौलिक स्वभाव। संसदीय चुनाव में दलों की जीत-हार को धर्मनिरपेक्षता की जीत-हार बताना, राजनीतिक रूप से ध्रुवीकरण या अन्यकरण के लिए चाहे जितना भी मुफीद हो, नागरिक दृष्टि से यह भ्रामक है। भारतीय जीवन के ऐसे संवेदनशील प्रसंग को चुनावी नतीजों के निकष पर कसने की प्रवृत्ति से बाज आना चाहिए। बहैसियत नागरिक मुझे नहीं लगता कि भारतीय जनता पार्टी को मिले अखंड जनादेश में सांप्रदायिकता के पक्ष में कोई संदेश है और न यह लगता है कि अभी आये उपचुनाव के चुनावी नतीजों में जाति समीकरण का कोई अपवित्र असर है। क्योंकि नागरिक मन यह नहीं मानता कि सांप्रदायिकता की काट जातिगत समीकरण है। आज की राजनीति जितनी जल्दी पुरानी राजनीति की इस भ्रामक मुहाबरेबाजी से बाहर अपनी समझ विकसित करे उतना ही शुभ है। आज की राजनीति को जनता के रोजी-रोटी, सामाजिक सम्मान, संतुलन तथा न्याय, अधिकारिकता और उपलब्धता को सुनिश्चित करने के बारे में सोचना चाहिए। समावेशी और सकारात्मक दृष्टिकोण के अपनाव का महत्त्व समझा जाना चाहिए। आज की राजनीति से उम्मीद करनी चाहिए कि जनादेश का राजनीतिक मिजाज पढ़ते हुए समाज के नागरिक मन के मर्म को ध्यान में रखे।


शनिवार, 16 अगस्त 2014

भारत के लोग भावुक उम्मीदों से भरे हैं, सुनो राष्ट्र, कान लगाकर सुनो



लालकिला से प्रधानमंत्री के बोलने का अपना महत्त्व है। प्रत्येक साल 15 अगस्त, स्वतंत्रता दिवस के दिन प्रधानमंत्री की बात सुनने के लिए, राष्ट्र का कान खड़ा रहता है। इस दिन लालकिला पर राष्ट्र-ध्वज को फहराना एक सपने के आसमान छूने जैसा होता है। तिरंगा के फहराने के साथ पूरे राष्ट्र की आशा, आकांक्षा लहराती है। सरकार के संकल्प, राष्ट्र की शक्ति, सहिष्णुता और साहस की झलक भाषण में ध्वनित होती है। 15 अगस्त, स्वतंत्रता दिवस के दिन प्रधानमंत्री की कही बात की अनुगूँज अगले साल 15 अगस्त तक सुनाई देती है, कई बार उसके बहुत बाद तक भी। इसमें, ऐसे कई गूढ़ संकेत होते हैं जिसे पूरी दुनिया पढ़ने की कोशिश करती है। यह सच है कि लालकिला से बोली गई हर बात अतीत में पूरी निष्ठा और बुद्धिमत्ता से जमीनी स्तर पर लागू हुई ही हो ऐसी बात नहीं, फिर भी इसका महत्त्व कम नहीं है। इस बार भी लालकिला से प्रधानमंत्री का भाषण हुआ। इसकी भी चर्चा हो रही है। इसके गूढ़ संकेतों को पूरी दुनिया अपने ढंग से पढ़ रही होगी। इस बार हुए भाषण की कुछ ध्यान देने योग्य खासियत रही है। जैसे,

प्रधानमंत्री के भाषण का अलिखित होना

प्रधानमंत्री ने इस बार भाषण पढ़ा नहीं, बल्कि भाषण किया। भाषण पढ़ने की तुलना में भाषण करना हमेशा अधिक प्रभावशाली और श्रेयस्कर होता है। भाषण देनेवाला अगर सुवक्ता हो तो फिर क्या कहने! तो फिर पहले के प्रधानमंत्री, अपवाद हो सकते हैं, लिखित भाषण पढ़ने की ही परंपरा पर क्यों चलते रहे? क्या उन्हें भाषण करना नहीं आता था! इस पर यकीन करना थोड़ा कठिन है। छोटी-बड़ी संस्थाओं की तरफ से उसके सचिव संस्था की साधारण सभा में अपना प्रतिवेदन पढ़ते हैं; अर्थात वह लिखित होता है। क्या सिर्फ लिखित होता है? नहीं अनुमोदित भी होता है। कौन अनुमोदित करता है? क्या सभी सदस्य? नहीं, साधारण सभा ने पहले से ही इसका दायित्व कार्य निर्वाही समिति (इक्चिक्यूटिव कमिटी) को सौंपा होता है। क्योंकि सचिव जिसकी तरफ से बोल रहा होता है, उसका अनुमोदन भी आवश्यक होता है। सचिव का भाषण व्यक्तिगत नहीं होता है। क्या प्रधानमंत्री का लालकिला से दिया जानेवाला भाषण व्यक्तिगत होता है? क्या प्रधानमंत्री के भाषण के प्रति सरकार की कोई जवाबदेही नहीं होती है? सरकार तो तभी जवाबदेह हो सकती है न जब उसने उस भाषण का अनमुोदन किया हो? भारतीय संविधान के प्रावधानों के अनुसार सरकार मंत्रीमंडल होता है और प्रधानमंत्री उसके कार्य प्रधान होते हैं। सरकार का गठन सामूहिक नेतृत्व के सिद्धांत के आधार होता है। यदि कोई प्रस्ताव मंत्रीमंडल में बहुमत के आधार पर अनुमोदित नहीं होता है तो उसे लागू नहीं किया जा सकता है। यह अलग बात है कि प्रधानमंत्री ऐसे किसी प्रस्ताव को पारित करवाने के लिए मंत्रीमंडल के पुनर्गठन की सिफारिश राष्ट्रपति से करें, लेकिन उस प्रस्ताव को फिर नये मंत्रीमंडल से ही सही, परंतु अनुमोदित तो करवाना ही होता है। संवैधानिक प्रमुख महामहिम राष्ट्रपति के अभिभाषण को भी मंत्रीमंडल का अनुमोदन हासिल होना आवश्यक होता है, क्योंकि वह पदासीन व्यक्ति का निजी भाषण नहीं होता है। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि स्वतंत्रता दिवस पर लालकिला से किये गये प्रधानमंत्री के भाषण का मंत्रीमंडल से अनुमोदित न होना कहीं सामूहिक नेतृत्व के आधार पर सरकार के गठन के सिद्धांत का स्थगन और संसदीय एकतंत्र के दौर के आरंभ की सूचना तो नहीं है? अलिखित भाषण के अनुमोदन का कोई प्रावधान नहीं है। भाषण के बहुत प्रभावशाली होने की प्रशंसा के बावजूद इस सवाल की वैधता पर कोई असर नहीं पड़ता है।

बलात्कार की घटनाओं पर शर्म से सिर का झुकना

यह सच है कि बलात्कार की इतनी अधिक घटनाएँ सामने आ रही है कि किसी का भी सिर शर्म से झुक जाना ही स्वाभाविक है। यह भी ठीक है कि इस तरह की घटनाओं को रोक पाना अकेले शासन-प्रशासन के बूता में नहीं होता है, हालाँकि, शर्म से सिर झुकाने के अलावे इस तरह की घटनाओं को रोकने में शासन-प्रशासन की बहुत बड़ी जिम्मेवारी भी बनती ही है। लेकिन जिस तरीके और तेवर से यह कहा गया कि क्या आप अपने बेटों को पूछने की हिम्मत करते हैं कि कहाँ जा रहे हो, कब आआोगे, आदि-आदि तो लगा कि यह स्कूल-कॉलेज स्तर की अभिभावक सभा में अभिभावकों की पस्त हिम्मत को ललकारने के लिए बोला जा रहा है। हाँ, अभिभावकों को अपने बेटा/ बेटों से जरूर पूछना चाहिए, परंतु इस मामले में अपराध के आँकड़े क्या बताते हैँ? हालाँकि, 18 वर्ष की उम्र सीमा पार कर जाने के बाद 'बेटा' वैधानिक रूप से अपना अभिभावक खुद हो जाता है, फिर भी अपराध के आँकड़े बताते हैं कि इस अपराध में 'अभिभावक की देख-रेख में पलनेवाले बेटों' के शामिल रहने से अधिक वे लिप्त होते हैं जो, 'अभिभावक की देख-रेख में पलनेवाले बेटों' के समूह से कब के बाहर हो चुके होते हैं। इस तरह की शर्मनाक घटना को रोकने के लिए अभिभावकों की हिम्मत को ललकारना जरूरी ही था इसके साथ ही शासन-प्रशासन को भी कुछ अधिक प्रभावी ढंग से कहा जाना चाहिए था। 

शौचालय प्रबंध
यह भी बड़ी चिंता की बात है। चुनावी भाषण के दौरान भी इस मुद्दे को उठाया गया था। यह स्वास्थ्य-संबंधी विश्व-मानक और गरीबी को परिभाषित किये जाने से भी जुड़ा हुआ मामला है। इस लक्ष्य को जितना जल्दी पूरा किया जा सके उतना ही अच्छा है। शौचालयों के कारगर होने के लिए पर्याप्त मात्रा में पानी की उपलब्धता भी जरूरी शर्त्त है। रेलवे के कुछ बड़े स्टेशनों/ ऊँचे दर्जे के विश्रामालयों को छोड़ दें तो, रेल के 10% शौचालय भी व्यवहार के लिए सुरक्षित नहीं हैं। महिलाओं के लिए चिह्नित शौचालयों की दशा तो और भी खराब बताई जाती है। इतनी बड़ी रेल-व्यवस्था जब शौचालय के सुरक्षित व्यवहार को सुनिश्चित नहीं कर पा रही है तब जिन गरीबों के पास रहने को घर नहीं है, अपने वास की जमीन नहीं है, जिन स्कूलों को छत नहीं है उनके लिए शौचालय के सुरक्षित व्यवहार का अवसर उपलब्ध होना कितना कठिन है, कहने की जरूरत नहीं है। असल में यह जीवन की अन्य जरूरतों को पूरा करने के लिए संसाधनों की उपलब्धता और आधिकारिकता से जुड़ा हुआ मामला है। उपलब्धता और आधिकारिकता को सुनिश्चित करने के संदर्भ में सुनियोजित तरीके से काम किये जाने की जरूरत है। लेकिन यह क्या, यहाँ तो योजना आयोग को ही निष्प्रभावी बनाने की योजना बन रही है। यह सच है कि उपलब्धता और आधिकारिकता को सुनिश्चित करने के संदर्भ में योजना आयोग की सीमाएँ रही हैं, लेकिन एक अर्थ में यह सरकार की ही सीमाओं का ही नतीजा या बाइप्रोडक्ट रही है। मंत्रीमंडल के सामूहिक निर्णय पर गठित योजना आयोग पर नेहरू -परिकल्पना की छाप रही है, हो सकता है इतने दिनों में उसके ढाँचे में ठीक न किये जा सकने लायक विकृतियाँ आ गई हों। सरकार सक्षम ढाँचा तैयार कर अपने लक्ष्य की तरफ कैसे बढ़ती है, यह देखने की बात है।


इस सरकार से लोगों को बहुत उम्मीद है। एक अर्से बाद अखंड बहुमतवाली सरकार अपने काम पर है। इससे भी लोगों की उम्मीदों में पंख लगे हैं। संसदीय एकतंत्र के दौर के आरंभ की सूचना पाकर भी कुछ लोग खुश होंगे। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री के भाषण का अपना महत्त्व है, जिसमें थोड़ी जगह भावुकताओं के लिए भी होती है और थोड़ी जगह उम्मीद के लिए भी होती है। इस समय उम्मीद के आकाश में जमीन के ख्वाब उड़ान पर हैं। भारत के लोग भावुक उम्मीदों से भरे हैं, सुनो राष्ट्र, कान लगाकर सुनो।