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मंगलवार, 14 जुलाई 2015

लोकशाही में शाही लोक!!

लोकशाही में शाही लोक!!
शोक ही शोक, अरे बाप रे कितना शोक
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उग्र नौकरशाह
व्यग्र जनतंत्री बादशाह
सक्रिय धन शाह
खनन शाह, मनन शाह
मदन शाह, मिलन शाह
गली शाह, मुहल्ला शाह
जिला शाह, हल्ला शाह
तंत्र शाह, मंत्र शाह
शाहों के शाह, शाहंशाश
आह-आह इतने शाह!
वाह-वाह कितने शाह!!
इत शाह, उत शाह,
तरह-बेतरह के शाह
सब में है भरपूर उत्साह
जनतंत्र में तंत्र शाह!
जन-गण-मन?? हतोत्साह!!!
हत उत्साह! हतोत्साह!!!

लोकशाही में शाही लोक!!
शोक ही शोक, अरे बाप रे कितना शोक!

मंगलवार, 7 जुलाई 2015

विकास का मतलब

भारत जब आजाद हुआ तो इसके समक्ष कई चुनौतियाँ थीं लेकिन आर्थिक विकास की चुनौती सबसे भारी थी। आर्थिक विकास के लिए दो चीजों की आवश्यकता थी, पहली योजना की और दूसरी उस योजना पर अमल करने के लिए आवश्यक धन की। योजना का ढाँचा पंचवर्षीय योजना के रूप में एक मॉडल तो मिल गया, लेकिन धन की आवश्यकता तो कर्ज से ही पूरी हो सकती थी। यह कर्ज भी तभी हितकर हो सकता था जब कठोर राजस्व अनुशासन का पालन उतनी ही कठोर नैतिक दृढ़ता से होता। कर्ज तो कठिन-आसान शर्त्तों पर मिल गया लेकिन राजस्व अनुशासन का पालन नैतिक दृढ़ता से नहीं हो पाया। हम ऋण की राशि का भी भोग-उपभोग करने से अपने को बरज नहीं पाये। प्रेमचंद ने कहा था, कर्ज वह मेहमान है जो एक बार आ जाता है तो फिर आसानी से जाता नहीं है। महात्मा गाँधी ने इशारा किया था कि अपनी आवश्यकता को शून्याभिमुखी बनाना जरूरी है, हमने इस पर कान नहीं दिया। कर्ज के माध्यम से विकास के जिस पिछलन भरे रासते पर हम चल पड़े, वह नैतिक, राजनीतिक, सामाजिक और यहाँ तक कि आर्थिक पतन की ओर हमें तेजी से ले गया। एक करुण उदाहरण के तौर पर देखें कि कैसा है यह दुश्चक्र! किसान आत्महत्या पर मजबूर क्यों होता है? जवाब है, कर्ज के दबाव के कारण। इससे मुक्ति का रास्ता क्या है? जवाब है, कर्ज उपलब्ध करवाया जाये। आज विकास का मतलब कर्ज हो गया है! जब चार्वाकों ने ऋण लेकर घी पीने की बात कही थी तो, अभिप्राय यह नहीं था। 

रविवार, 24 मई 2015

सब ज्ञान गोबर!

आभासी को वास्तविक समझना और फिर प्रयोजन के समय परेशान होने को 'चित्र तुरंग न्याय' से समझा जा सकता है। घोड़ा (तुरंग) का दिखाकर किसी का पूछना कि यह क्या है और हमारा जवाब देना कि यह घोड़ा है, तब तक ठीक है जबतक पूछनेवाला उसकी सवारी का हुक्म न दे। हुक्म सुनने के बाद यह परेशानी होती है कि अब इसकी सवारी कैसे की जाये! तब घोड़ा और उसके चित्र का अंतर समझ में आता है। सेव का चित्र दिखाकर बच्चों को समझाया जाता है कि यह सेव है। बच्चा इसी तरह से सीखता चलता है! बच्चा बड़ा होता है, हमारी तरह। हम सभी अंततः सेव के चित्र को सेव ही कहते हैं! जब तक खाने का ख्याल न आये तब तक ठीक है, खाने का ख्याल आते ही सब ज्ञान गोबर! हम विचार और व्यवहार की दुनिया में इस 'चित्र तुरंग न्याय' की चपेट में पड़ते ही रहते हैं! अब आदमी कितना सावधान रहे कि सेव के चित्र को देखकर अपने अंतर्मन में समझे और कहे कि यह सेव नहीं सेव का चित्र है! आभासी और वास्तविक को सिर्फ प्रयोजन से जोड़कर ही समझा जा सकता है! फिर हमारे समय और साथ के बहुत सारे महापुरुष ही नहीं, बहुत सारे मित्र, नातेदार, रिश्तेदार यहाँ तक कि कविता आदि भी महापुरुष और मित्र, नातेदार, रिश्तेदार और कविता आदि के चित्र ही साबित होंगे। वे ही नहीं, बल्कि हम खुद को भी चित्र साबित होने से बचा नहीं पायेंगे; कम-से-कम मैं तो खुद को चित्र साबित होने से नहीं बचा पाऊँगा। क्या कहते हैं! क्या हम सब 'चित्र तुरंग न्याय' की चपेट में नहीं हैं! क्या प्रयोजन पड़ते ही हमारा सब ज्ञान गोबर नहीं हो जाता है!

गुरुवार, 23 अप्रैल 2015

हवा

हवा से दोस्ती की जब से मछलियों को पानी की तड़प में मजा आ रहा है
वक्त ने रुख बदला हवा का दोस्तों के रास्ता से ये कौन आ रहा है
दोस्त गजब खूबसूरत हो तो क्या बबाल है
दोस्ताना सम्हाले या खूबसूरती ये सवाल है
किताब कोई नहीं ऐसे कातिब का क्या करे कोई
इजलास में हाकिम को सजाये ऐसे कातिल का क्या करे कोई

मंगलवार, 21 अप्रैल 2015

विश्वास अंधा होता है

जहाँ ज्ञान की सीमा, बाहरी और भीतरी दोनों, समाप्त होती है विश्वास का क्षेत्र शुरू होता है। ज्ञान, संदेह के अलावे, हर बात पर संदेह करता है। आधुनिकता का प्रारंभ रेने देकार्त के संदेह करने से होना माना जाता है। आधुनिकता का संबंध ज्ञानोदय से है। आधुनिकता अंधविश्वास से टकराती है। संदेह ज्ञान से ऊपजता है। जहाँ ज्ञान ठहर जाता है, वहीं संदेह रुक जाता है, जहाँ ज्ञान और संदेह दोनों साथ छोड़ जाते हैं, विश्वास आदमी को और आदमी विश्वास को थाम लेता है। ज्ञान का ठहर जाना आँख का साथ छोड़ जाना होता है। जिनकी दृष्टि दृश्य के पार, बुद्धि और ज्ञान के सहारे, हमेशा कुछ टटोलती रहती है, वे विश्वासी नहीं होते हैं। जिनकी दृष्टि दृश्य के पार देखने की संभावनाओं को नहीं टटोलती वे विश्वास के क्षेत्र में प्रवेश कर जाते हैं। पूर्ण अंधत्व पूर्ण विश्वास का शर्त्तिया आधार होता है।

कहा जाता है कि प्रेम अंधा होता है। क्योंकि प्रेम का आधार पारस्परिक विश्वास होता है। संवेगात्मक परस्पराश्रयिता Emotional Mutual Dependency पारस्परिक विश्वास की विधायिका होती है। ज्ञान और विश्वास से प्रेम के संबंध में प्रेम के पक्ष का महत्त्व जब माधव किसी तरह से उद्धव को नहीं समझा पाये तब उन्हें प्रेम पोषिता गोपियों के पास भेज दिया। उद्धव के वहाँ पहुँचने के पहले गोपियों ने समवेत रूप से तय कर लिया न उद्धव का ज्ञान लेना है और न माधव का प्रेम देना है। हिंदी लोक के मन यह उक्ति बैठ गई--- न उधो का लेना, न माधो का देना! Emotional Mutual Dependency में से पारस्परिकता-- Mutual-- गायब हो जाने पर सिर्फ संवेगात्मक आश्रयिता------ Emotional Dependency बचती है। सामान्य उदाहरण लें तो यह प्रथमतः शगुन विचार में प्रकट होता है और अंततः रोजमर्रा के अन्य व्यवहार में विकट होकर समाया रहता है। संदेह होगा तो विश्वास नहीं और विश्वास होगा तो संदेह नहीं। आदमी के ज्ञान की सीमा बहुत जल्दी प्रकट हो जाती है और विश्वास के क्षेत्र में वह जल्दी ही प्रवेश कर जाता है, इसलिए सामान्य लोगों की बात ही क्या कई बार बड़े-बड़े वैज्ञानिक भी शगुन विचार से बाहर नहीं निकल पाते हैं! पढ़े-लिखे, शिक्षित लोगों की अंगुलियों में ग्रह शांति की मुद्रिकाएँ अधिक शोभायमान होती हैं! आदमी के ज्ञान की सीमा चाहे जितनी जल्दी प्रकट हो जाये लेकिन मि. विश्वास के घर (प्रसंगतः, वी. एस. नयपॉल की एक किताब का यह नाम है।) में वह अतिथि ही होता है और अधिक देर तक नहीं ठहरता है। जिंदगी ज्ञान और विश्वास दोनों के सहारे चलती है! 

सृष्टि में सारी चीजें एक दूसरे से जुड़ी हैं। जुड़ाव एक अपर को आश्रय देता है। लेकिन आश्रय की मात्रा एक स्तर तक बढ़ जाने के बाद ही कोई एक चीज दूसरे से पर आश्रित होती है।

दोस्ती का मूलमंत्र है अनाश्रित भरोसा 
-- Non-dependent dependability

जिसे हम मुहब्बत कहते हैं, उसे संवेगात्मक परस्पराश्रयिता-- Emotional Mutual Dependency के रूप में समझा जा सकता है। संवेगात्मक परस्पराश्रयिता की मात्रात्मक स्थिति की पारस्परिकता हमेशा एक जैसी नहीं रहती है, एक खास परिवृत्त -- Range--- में गतिमान रहती है। संवेगात्मक परस्पराश्रयिता की मात्रात्मकता की अधिकता के अधिक समय तक एक मान पर स्थिर रहने या पारस्परिकता में असंतुलन बढ़ जाने से से व्यक्तित्व में एक अव्यवस्था उत्पन्न हो जाती है जिसे Emotional Dependency Disorder के रूप में समझा जा सकता है। इसे दूर किया जा सकता है...

पूरी सृष्टि में परस्पराश्रयिता सक्रिय रहती है। इस नैसर्गिक परस्पराश्रयिता के साथ सभ्यता में सहमति, लेकिन अधिकतर मामलों में वस्तुतः असहमति, के आधार पर सामाजिक संबंधों में परस्पराश्रयिता सक्रिय रहती है। संवेगात्मक परस्पराश्रयिता-- Emotional Mutual Dependency के अलावे भी बहुत सारी Dependencies हैं। वित्तीय, सामाजिक, आदि, इन सभी प्रकार की परस्पराश्रयिताओं को Power Dependencyकह सकते हैं। यहाँ Power से मुराद उस प्रविधि से है जिस से आकांक्षित/ इच्छित परिणाम हासिल होता है। मुख्यतः भौतिक परिस्थितियों और कठ-अहं---- False Ego और संघाती संवादों - Conflicting Communication के कारण Emotional Mutual Dependency (मुहब्बत) में से कभी Emotional पक्ष तो कभी Mutual पक्ष, तो कभी दोनों पक्ष कमजोर पड़ने लगता है, या गायब हो जाता है, लेकिन Dependency के बनी रहने तक संपर्क --- मधुर न सही, असंतुलित ही सही--- बना रहता है। Emotional Mutual Dependency असंतुलित होकर अंततः Power Dependency में बदल जाती है। Power Point पर प्रभुत्व जमाकर बैठा पक्ष यदि Power Dependency को संतुलित करने के विवेक और कौशल का इस्तेमाल नहीं करता है तो संवेगात्मक परस्पराश्रयिता Emotional Mutual Dependency का तत्त्वांतरण संवेगात्मक गुलामी---- Emotional Enslaving में होने लगता है और संवेगात्मक अतिचार---- Emotional Torture के रूप में प्रकट होता रहता है। मुहब्बत का रिश्ता हो या रिश्ते के किसी रूप में मुहब्बत हो इस में आज संवेगात्मक अतिचार---- Emotional Torture बढ़ रहा है तो इसे Power Discourse के रूप में समझते हुए बढ़ती हुई Power Dependency को दूर करने/ कम करने के लिए सचेत होकर Power Point की निर्मिति को समझना जरूरी है। संवेगात्मक अतिचार---- Emotional Torture आदमी को तोड़कर रख देता है!! खुद को और खुद से जुड़ो लोगों को संवेगात्मक अतिचार---- Emotional Torture से बचाना जरूरी है। क्या कहते हैं आप! 


रविवार, 1 मार्च 2015

जीना हुआ मुहाल

बच्चों को नहीं रोजी, ना माँ-बाप का कोई ख्याल
पूछते हैं भरता क्यूँ नहीं टैक्स अरे कल्लू कव्वाल

चादर भीतर पाँव पसारें, अब ये कैसे करें कमाल
चादर कित पावैं हाथ में है बचा क्या कोई रुमाल

मध्य वित्त नहीं रे बाबा वित्त मध्य है खड़ा सवाल
यंग इंडिया! चूँ की हिम्मत या है कोई तेरी मजाल

वे खुश, नहीं मचा है नहीं मचेगा कोई बड़ा बबाल
मचा अगर तो आयेगा काम किस दिन ये कोतवाल

कमुआ लुट गया मलुआ लूटा जी हो गया मालामाल
पैंतीस का बीस, कभी यंग न होता, रहता है बेहाल

क्या करे कुछ समझ न आये अब जीना हुआ मुहाल
सेवक जी सेवा के चौदह फीसद पर, फिक्स दलाल

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

निराशा की गहरी घाटी में आशा की प्राणघाती छलाँग

उम्मीदों की उड़ान
साल 2015 दिल्ली विधान सभा के लिए होनेवाला चुनावी दंगल दिलचस्प दौर में पहुँच गया था। बड़े, राष्ट्रीय, राष्ट्रवादी दलों की हालत शिकस्त थी। उनके आत्म-विश्वास का लुट जाना तो साफ-साफ दिख रहा था। नागरिक मन में आकार पा रहे यथार्थ और स्वप्न का मुँह विज्ञापन से ढकने और उसकी निःशब्द आवाज को राजनीतिक भाषणों के कोलाहल में घुला दिये जाने की पुरजोर अश्लील कोशिश तेज थी। इस यथार्थ और स्वप्न को समझें तो, यथार्थ राजनीतिक जमात के द्वारा बार-बार के नागरिक छल से उत्पन्न जीवन स्थिति और स्वप्न इस जीवन से बाहर निकलने के लिए नागरिक जमात की पहल से पैदा जनाकांक्षा थी। जनाकांक्षा जनादेश में बदल रही थी और चुनावी जीत-हार का नतीजा जब प्रकट हुआ तब नागरिक मन की निःशब्द आवाज के स्तब्धकारी असर का पता चला। अपने फटे हुए अहं के साथ हाँफते हुए रणनीतिकार अपने अंतरंग में स्तब्ध, निःशब्द और संशय से घिर गये। प्रवक्ताओं के चेहरे पर उभर आई चिंता रेखाओं का बाँकपन और मुस्कान का कौशल कोई भी अर्थ पैदा करने में विफल हो रहा था। लहरों में इतनी भी ताकत नहीं बची कि ढंग से पछाड़ भी खा सके, बुक्का फाड़कर रो सके या शोक मनाये। शोक मनाने लायक भी शक्ति तो नहीं बची! एक बात कहना जरूरी है कि इस तरह का स्तब्धकारी असंतुलित बहुमत किसी सामंजस्यपूर्ण सामूहिकता से नहीं बल्कि उन्माद ग्रस्त सामूहिकता से निकलती है। अहं का विकल्प उन्माद नहीं हो सकता!

स्तब्धकारी बहुमत हासिल करने पर आम आदमी पार्टी को बधाई। लेकिन यह भारतीय जनतंत्र और भारत राष्ट्र के लिए शुभ संकेत नहीं हैं। अपनी इस बात का अर्थ जानता हूँ और यह भी जानता हूँ कि जो अकेले पड़ जाने के जोखिम से डरकर अपनी समझ को सार्वजनिक करने से रह जाता है, समाज की समझ को दुरुस्त करने में सहायक नहीं हो सकता। भारतीय जनतंत्र के लिए यह शुभ लक्षण नहीं है! क्यों? क्योंकि, जनतंत्र में विपक्ष की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण होती है। इस तरह का स्तब्धकारी बहुमत सत्ता के स्वर से भिन्न किसी सुझाव के स्वर को शक्तिहीन बना देता है। किसी भी सूरत में अपने सारे लोक लुभावन महत्त्वपूर्ण चुनावी वायदे को व्यवहार के स्तर पर पूरा कर पाना असंभव ही होता है। ऐसे में, अपने लोक लुभावन महत्त्वपूर्ण चुनावी वायदे को पार्टी बाद में "चुनावी जुमला" मानने और मनवाने के लिए बाध्य होने लगती है। स्तब्धकारी बहुमत में निहित सन्निपाती लक्षण बताता है कि गहरी निराशा से आहत हमारा नागरिक मन आशा की प्राणघाती छलांग लगाने की व्याकुलता से ग्रस्त हो रहा है। अति और अतिरेक कभी शुभ नहीं होता। दिल्ली भारत राज्य की ही नहीं, भारत राष्ट्र की भी राजधानी है। राज्य और राष्ट्र का अंतर साफ हो तो, यह मान लेने में संकोच न होगा कि राज्य जनहित से जितना मुँह मोड़ेगा राष्ट्र की जरूरत जन एकजुटता के लिए उतनी बढ़ती जायेगी, खासकर तब जब विभिन्न कारणों से वर्गबोध का सक्रिय हो पाना असंभव-सा ही रह गया हो। पहले से ही नगरवासी, ग्रामवासी की तुलना में, राज्य प्रदत्त अवसर का लाभ अधिक पाते/ उठाते हैं। दिल्ली यदि अपने रहिनहारों के लिए अधिक सुविधा सुनिश्चित करने की तरफ बढ़ती है तो जाहिरा तौर पर सभी प्रदेश इस ओर तेजी से बढ़ेंगे। नागरिकता के लाभों की अति-नगर-केंद्रिक उपलब्धता भारत राज्य और भारत राष्ट्र दोनों के लिए क्षतिकर है। 

हों जश्न में शामिल शौक से, मगर यह न भूलें कि स्तब्धकारी बहुमत के असंतुलन में भारतीय जनतंत्र और भारत राष्ट्र के लिए शुभ संकेत निहित नहीं हैं। अराजकता अर्थात, राज्य विहीनता, राज्य के अतिचार से बाहर निकलने की भावुकता भर नहीं एक ठोस राजनीतिक विचार भी है। ऐसे में वर्त्तमान चुनौती यह है कि क्या राज्य विहीनता में राष्ट्र को एक रखने की किसी भी चिंता के लिए कोई जगह बची रहती है! क्या राज्य विहीनता में शक्ति-संपन्न घरानों के अंदर राज्य की तरह के आचरण की स्वयंभू प्रवृत्ति की समता विरोधी बाढ़ को रोकने की कोई क्षमता या इच्छा होती है! भ्रष्टाचार जनतंत्र और पूँजीवाद के अंतर्विरोध से पैदा होता है तो, क्या राज्य विहीनता जनतांत्रिक मूल्यों को बचाने के लिए जनतंत्र और पूँजीवाद के अंतर्विरोध के पार नागरिक जीवन को स्वच्छ जमीन के निर्मल आकाश तक ले जा सकती है! यदि इन सवालों के जवाब व्यावहारिक स्तर पर नकारात्मक मिलता है, जिसकी आशंकाओं का ब्यास बहुत बड़ा है, तो निश्चित ही यह स्तब्धकारी बहुमत निराशा की गहरी घाटी में आशा की प्राणघाती छलाँग साबित होगा।