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बुधवार, 21 अक्टूबर 2015

पता नहीं देश चल रहा कि जल रहा है


सब कुछ सुरक्षित है अपनी जगह पूजा पाठ और ध्यान
व्यवस्था अवस्था संविधान शासन प्रशासन योगासन
जिस से भी चलता है देश
हाँ सभी मर्माहत हैं दुखी, उदास और परेशान
हर किसी के पास इस के लिए अपने-अपने कारण हैं

अपने-अपने कारणों और तरीकों से
दुखी उदास और परेशान होने का
मौलिक अधिकार हर किसी के पास है
हर कोई अपने-अपने कारणों के साथ
अपने मौलिक अधिकार के पक्ष में है तैयार
आइये मार्यादा में रहकर चैनलों पर बहस करते हैं
और यह पहली बार नहीं हुआ है
याद है न बेलछी, बाथे गोहाना, जाने कितने और नाम हैं

और फिर उसके बाद, और फिर उसके बाद
अबकी बार सुनपेड़ गांव, होता ही रहता है सरकार
मुआवजा आश्वासन न्याय के तो हैं सब-के-सब हकदार

पता नहीं देश चल रहा है कि देश जल रहा है









शनिवार, 18 जुलाई 2015

तालीम-तलब से बगरू

यूँ तो तस्वीरों में कभी खुद को सुर्खरू लगता हूँ
हकीकत में ना जाने क्यों बहुत उकरू लगता हूँ

किसी बात पर अड़ जाता और जकरू लगता हूँ
कमजोर भीतर से कि बाहर से जबरू लगता हूँ

ऐसी लड़ाई खुद से कि खुद को झगरू लगता हूँ
बक-बक बक-बक करता इतना बकरू लगता हूँ

तकौनी में बीती जिंदगी तीसरा पठरू लगता हूँ
ऋण-मुक्त नींद की चाह विकल बदरू लगता हूँ

हमकलामी में तालीम-तलब से बगरू लगता हूँ
फिर-फिर लौटता इस मामले में हेहरू लगता हूँ

गुरुवार, 16 जुलाई 2015

रहा सो रहा

जी हाँ किसी ने कुछ नहीं कहा
हर किसी ने अपना दुख सहा

और उसका इंतजार बना रहा
ढाल नहीं छाता-सा तना रहा

सभा में बोलता खामोश रहा
और खामोश ही बोलता रहा

जितना ऐंठा, अहं ढहता रहा
हरियरी में जंगल जलता रहा

हाँ अबोला को ही सुनता रहा
जो नहीं बोला उसे धुनता रहा

कहिये कि अब जो रहा सो रहा
किस के सामने जो अब रो रहा

मंगलवार, 14 जुलाई 2015

लोकशाही में शाही लोक!!

लोकशाही में शाही लोक!!
शोक ही शोक, अरे बाप रे कितना शोक
===================
उग्र नौकरशाह
व्यग्र जनतंत्री बादशाह
सक्रिय धन शाह
खनन शाह, मनन शाह
मदन शाह, मिलन शाह
गली शाह, मुहल्ला शाह
जिला शाह, हल्ला शाह
तंत्र शाह, मंत्र शाह
शाहों के शाह, शाहंशाश
आह-आह इतने शाह!
वाह-वाह कितने शाह!!
इत शाह, उत शाह,
तरह-बेतरह के शाह
सब में है भरपूर उत्साह
जनतंत्र में तंत्र शाह!
जन-गण-मन?? हतोत्साह!!!
हत उत्साह! हतोत्साह!!!

लोकशाही में शाही लोक!!
शोक ही शोक, अरे बाप रे कितना शोक!

मंगलवार, 19 मई 2015

ऐ वतन रहने दे बुझी आँखों में सूखे का सन्नाटा

जिसे चोट खाकर सम्हलना ही नहीं आता वह मुहब्बत करे तो क्यों
आकाश आह भरे और धरती पर जो इस कदर बिखर जाये तो क्यों

बात कुछ और होगी दिल दिवाना जो महफिल में जिक्र करे तो क्यों
गैर के हाथ रुमाल का लहराना गीली आँख अब कबूल करे तो क्यों

हम खयालों की दुनिया में रहनेवाले गैर जमीन पर पग धरे ही क्यों
हासिल कुछ होना नहीं ख्वाबों की किरचों के सिवा तो डरे ही क्यों

गैर की हो गली तो आखिर कोई किसी गुलमुहर के तले मरे ही क्यों
तरन्नुम दिलकश मगर जो दिल से रिश्ता नहीं कोई कान धरे ही क्यों

जो बहार खिजाँ की यारी से ही मकबूल अगवानी उसकी करे ही क्यों
ऐ वतन रहने दे बुझी आँखों में सूखे का सन्नाटा पानी कोई भरे ही क्यों

मंजिल नहीं इंतजार में खफा-खफा उठे कदम जल्दबाजी करे ही क्यों
लो पूछे राधा अगर गोकुल बहुत प्यारा कन्हैया तो फिर डगरे ही क्यों



गुरुवार, 7 मई 2015

टूअर सच, हम और हमारा उरढ़ता हुआ झूठ

जवानी होती तो मर मिटता 
बुढ़ापे में तो ढंग से मरा भी नहीं जाता
कितने खुश थे हम उन दिनों
जिंदगी के शुक्रगुजार थे और अपने होने में थे निहाल
हम रिश्ते को जीते रहे, इस कदर खुशी थी बेमिशाल
वे दिन भी कितने सतरंगी थे, 
इंद्रधनु की तरह तनी हुई विनम्रता से संतृप्त
जब कुछ झूठ तुम्हारे शामिल थे और बहुत सारे मेरे भी
इस तरह चारों तरफ थी हरियाली और हरियाली
टूअर सच का एक टूटा टुकड़ा बिलखता हुआ 
जाने किस अबांछित दिशा से आया 
आया और हमारे झूठ को उराढ़ने में कामयाब होने लगा
सबसे बड़ी मुसीबत यही है हमदम कि अब इस उम्र में 
हमारे झूठ को उराढ़ने में टूअर सच का टुकड़ा कामयाब होने लगा है
और अब ये टूअर सच, हम और हमारा उरढ़ता हुआ झूठ 
कितना भयावह है इन सबके साथ होना और दिखना

बुधवार, 22 अप्रैल 2015

कोई मुझे रुला दे

जी मेरी आँखों में आँसू नहीं, कोई मुझे रुला दे
हाँ फिर चाहे तो उम्र भर के लिए मुझे भुला दे

बहैसियत इश्क-ए-जम्हूरियत कोई जो भुला दे
इन रगों के खून में जो ख्वाब इस कदर घुला दे

फिर पाँच वर्षों तक पानी नहीं बस बुलबुला दे
जी मेरी खैर-ओ-खुशी अपनी तकरीर से बुला दे


अपने खिलाफ मेरा गुनाह मुझ से ही कबुला ले
खुदकुशी का सामान तरकीब से सामने झुला दे

सियासत क्या जो नीयत को ही न ढुलमुला दे
तवारीखी इल्म हासिल इससे तू मिलाजुला दे

दर्द दामन में जो है महफूज उसे चैन से सुला दे
नई सफर के हौसले को तो मौसम कोई खुला दे

गुरुवार, 16 अप्रैल 2015

मुहब्बत बहुत ही कबीराना है

ये मुहब्बत बहुत ही कबीराना है न जाने किस तरह तुम ने जिया होगा
मजाजी, हकीकी कई रंग हैं इश्क के जाने कब किस रंग को चुना होगा

जिंदगी जीने का वक्त कम मुख्तसर, जाने वक्त किस तरह दिया होगा
कई तरीके हैं जीने के जमाने में, जाने कब किस तरीके को चुना होगा

बेरंग पानी भी नहीं तो जज्बात को जाने किस तरह बेरंग किया होगा
अपनों में पराये और परायाओं में अपने, जाने कैसे अपना किया होगा

जाने तुम्हें मोह का कौन-सा मंतर कब बाजार ने इस तरह दिया होगा
खुशबू जो हँसी में है जाने उसे किसने कब किस सामान से लिया होगा

दिल देह में रहता था, अब दिल में देह को जाने किस तरह सिया होगा
झूठ हो बेशक इश्क ने हर आँख को यकीनन कभी-न-कभी रुलाया होगा



मंगलवार, 14 अप्रैल 2015

मैं क्या करूँगा

अब तुम ही बताओ दिन की चाँदनी का मैं क्या करूँगा
है मुहब्बत नहीं, तो फिर मेहरबानी का मैं क्या करूँगा

जो टिक न पाया आँख में उस पानी का मैं क्या करूँगा
समझ के भीतर छिपी तेरी नादानी का मैं क्या करूँगा

मुफलिसी हँसती है तेरी हुक्मरानी का मैं क्या करूँगा
अब दर्द में डूबी अपनी इस कहानी का मैं क्या करूँगा

उम्र कट गई अब बता इस लंतरानी का मैं क्या करूँगा
जब पाँव में न अटे तो, उस जूते जापानी का मैं करूँगा

भूख नाचती है सामने, ताल रुहानी का मैं क्या करूँगा
गाँव न गाँठ में कुछ, तेरी निगरानी का मैं क्या करूँगा

शनिवार, 11 अप्रैल 2015

'सभा' में 'सभी' भ्रामक पद नहीं


'सभा' में 'सभी' भ्रामक पद नहीं
इस समय भी एक 'सभा' है और 'सभी' हैं,
यकीनन 'सभा' में 'सभी' भ्रामक पद नहीं

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थे धर्मराज सद्यः और सदेह 
उनके ठीक सामने थी धर्म की मार्यादा
अपनी पूरी शक्ति के साथ थे गदाधारी
जो जानते थे शक्ति के सीमांत पर अपने होने का अर्थ
धनुर्धारी को गर्व था गांडीव पर
जानते थेप्रत्यंचा खीचने के लिए
पीछे जगह न हो तो बेकार है धनु!
और पितामह!
वे तो राज की रक्षा की वचनबद्धता में चीखते हुए भी
अपनी खामोशी की गुफा के बहुत अंदर
हस्तिनापुर के जनमन से इतर और उत्तर
थे अपनी खामोशी की गुफा के बहुत अंदर!
इस तरह जो भी थे,
अपने होने में भी नहीं थे,
उनका होना न होना था।
वे सभी बने थे
धर्म, शक्ति, विद्या और वचनवद्धता के एक गुणसूत्र से
और वे अपनी बनक में एक सूत्री थे
उनमें बाहरी चपलताएँ हिलोर तो बहुत मारती थी
लेकिन भीतर की एक गुणसूत्रता में
बदलाव की गति नहीं थी
और न थी कोई मति,
थी आंतरिक गतिमयता अचिन्हे शून्य में स्थिर!
जानती थी द्रौपदी भी इस बात को
इसलिए बाहर से इन्हें धिक्कारते हुए
भीतर से संयत थी।
जानती थी कि सिर्फ केशव ही हैं
पूरे परिप्रेक्ष्य में बहुगुणसूत्रात्मक बनक से लैस
अपने पहचाने हुए शून्य में स्थिर रहते हुए भी
आंतरिक गतिमयता से भरपूर और चपल
उनकी बनक में थे बहुत सारे सूत्र और
इसे जानती थी द्रौपदी
क्योंकि उसने देखा था
विराट का भीतरी रूप अपने एकांत में!
पांचाली, राधा और कुब्जा बहुतेरे के के बहुगुणसूत्र
उस समय केशव की बनक में झनझना रहे थे
पांचाली ने गुहार लगाई
बहुगुणसूत्री बनक की उस झनक को!
न सुदर्शन चक्र चला,
न कोई अस्त्र या शस्त्र या शास्त्रार्थ!
बस केशव थे जो वस्त्र में बदलते चले गये
केशव वस्त्र छुपाना ही नहीं,
खुद को वस्त्र में बदलना भी जानते थे
और हाँ, जानती थी पांचाली भी केशव की इस कला को!
इस समय भी एक 'सभा' है और 'सभी' हैं,
यकीनन 'सभा' में 'सभी' भ्रामक पद नहीं
सभी एक गुणसत्री हैं
वे अपने होने में ही धन्य हैं और
मन से नहीं जन से बेपरवाह
खुद को वस्त्र तो क्या
विधेयक में भी नहीं बदल सकते
भूमि अधिग्रहण बिल में प्रवेश करते ही
उनकी असहमति सीधी हो जाती है
पिता कहा करते थे मेरी ऐंठ को ललकारते हुए,
बिल में घुसते ही साँप सीधा हो जाता है
हालाँकि मैं वह नहीं था
जो पिता समझते थे
क्योंकि वे भी एक गुणसूत्री थे
और मैं अपने गुमान में
बहुगुणसूत्री होने की तरफ बढ़ रहा था
अफसोस!
'सभा' में 'सभी' के सामने शर्मिंदा हूँ कि
यह सभा भी एक गुणसूत्री है
खूबसूरत बात यह कि
मेरे पास इस अफसोस से बाहर निकलने के लिए
जरूरी भ्रम सुरक्षित है।

हे माँ, देखने के बाद भी हम कहाँ देख पाते हैं



मातृत्व की संभावनाओं से समृद्ध होने के कारण
औरत की सामाजिक समझदारी मर्दों के मुकाबिले कहीं अधिक होती है
किसी औरत में मातृत्व की संभावनाओं के प्रकट होते ही
औरत के खून का नमक नृत्य में तब्दिल होने लगता है
और आँख के नींबू में थरथराने लगती है नई हलचल
किसी औरत में मातृत्व की संभावनाओं के प्रकट होते ही
बदलने लगती है आकृति और थोड़ी-सी पृथ्वी और इक जरा-सी प्रकृति भी


नमक के नृत्य और नींबू की थरथराहट में औरत का तब्दिल होना
उफ्फ! इस तब्दिल होने को समझना मुश्किल नहीं ना-मुमकीन होता है
पुरुष पदार्थ स्त्री तत्त्व को समझने में ना-काम ठहरता है

गृह निष्कासन के ठीक बाद इसे सीता में सुगबुगाते हुए बाल्मीकि ने देखा
दुष्यंत की तलाश में आश्रम से बाहर श्लथ पग धरते शकुंतला में कालिदास ने देखा
गोबर के चिनगारी छोड़कर भाग खड़े होने के बाद धनिया में होरी ने देखा
देखा, नमक के नृत्य और नींबू की थरथराहट में औरत का तब्दिल होना देखा
देखा मगर, बहुत करीब जाकर भी कहाँ समझ पाये!

देखने के बाद भी, हम कहाँ देख पाते हैं माँ का चेहरा
बहुत करीब जाकर कभी देखा भी, तो कहाँ समझ पाये होते हैं!
वर्षों पहले नमक के नृत्य और नींबू की थरथराहट में
बदली उस आकृति और थोड़ी-सी पृथ्वी और इक जरा-सी प्रकृति को ही
कुछ इस तरह पुरुष पदार्थ स्त्री तत्त्व को समझने में ना-काम रहता है कि
देखने के बाद भी हम कहाँ देख पाते हैं माँ का चेहरा


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  • Bharat Bharati SamajRam MurariPushpa Roy और 25 अन्य को यह पसंद है.
  • Neel Kamal प्रभावशाली कविता ।
  • Uday Raj Singh Badhiyaa aur marmasparshee. Aabhaar !
  • Prafulla Kumar Singh Really,we can't understand our mothers. Why did they suffer much in order to bring us in this world?
  • Vinay Sheel देखने के बाद भी हम कहाँ देख पाते हैं माँ का चेहरा ...
  • Mamata Ranjan Trivedi बहुत ही सारगर्भित
  • Vikram Kshatri सत्यम शिवम् सुंदरम है माँ ।
  • प्रफुल्ल कोलख्यान सामान्यतः पाठ के स्तर पर कविता में प्रयुक्त प्रसंगों में से अपनी उस समय की रुचि के अनुरूप कुछ प्रसंगों को ग्रहण करते तो कुछ को छोड़ते आगे बढ़ जाते हैं। यही सामान्य पाठ प्रक्रिया है। मुझे बहुत अच्छा लगा कि इस सामान्य पाठ प्रक्रिया के बाहर निकलकर एक मित्र ने आत्मीय ढंग से नमक के नृत्य और नींबू की थरथराहट में औरत का तब्दिल होने को विस्तार से जानना चाहा! अब मैं क्या जवाब दूँ! जानता हूँ कविता भाषा की अबौद्धिक प्रक्रिया है, यह बहुत ही आसान जवाब होता। लेकिन सवाल बहुत ही निश्च्छल और वैध है, इसका उत्तर शाद अन्य लोगों के लिए भी उपयोगी हो सकता है। नमक क्षारीयता और नींबू अम्लीयता का संदर्भ है। सृष्टि में जो सृजन का क्षारीय और अम्लीय अंतर्क्रियाएँ चलती रहती हैं उनके रासायनिक-भौतिक संदर्भों को देखा जा सकता है। प्राकृतिक सृजन की की संभावनाओं से समृद्ध होने के कारण औरत की प्राकृतिक स्थिति मर्दों से भिन्न होती है और यही भिन्नता वह कारण है कि औरत के खून का नमक नृत्य में तब्दिल होने लगता है और आँख के नींबू में थरथराने लगती है नई हलचल। इससे आगे जानना हो तो कविता खुद बोलेगी या उसकी तरफ से साक्षी विज्ञान की हो सकती है। कोई प्रसंग उठा तो फिर कभी...
  • Yojna Kalia कविता अपने विविध स्तरीय धरातलों से बात करती है ।यह कतई आवशक नहीं कि पाठक और लेखक का धरातल एक हो पाए।रचनाकार की रचना उसके अपन परिवेश एवं स्थि तियों का परिणाम और पाठक का अर्थ स्वीकार उसकी विविध भिन्न परिस्थिति का हो सकता है। दोनों को आजादी है अपने अपने रस को अपने ढंग से लेने की।यहाँ हर पाठ उसी रचना में से नये अर्थों को तलाश कर स्वयं भी लेखक के सममक्ष पहुंच सकता है
  • Ram Murari बदली उस आकृति और थोड़ी-सी पृथ्वी और इक जरा-सी प्रकृति को ही
    कुछ इस तरह पुरुष पदार्थ स्त्री तत्त्व को समझने में ना-काम रहता है कि
    देखने के बाद भी हम कहाँ देख पाते हैं माँ का चेहरा...

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10 अप्रैल को 06:46 पूर्वाह्न बजे ·