शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

राहत के लिए तो शुक्रिया, लेकिन यह कोई राह नहीं है

इस समय बहुत बड़ी आबादी पानी के घेरे में है। ये लोग कष्ट में हैं। इनके चित्र, क्लिपिंग्स मनोरंजक दृश्य नहीं हैं।
अकेले बिहार भारत की आधी आबादी के लिए अन्न पैदा कर सकता है, ऐसा हरित क्रांति के पुरोधा ने केरल के त्रिशूर विश्वविद्यालय के एक दीक्षांत समारोह में आज से कई साल पहले कहा था। शर्त्त यह कि पानी की अनियंत्रित अतिरिक्त उपलब्धता को प्रबंधित किया जा सके। यह न किया जा सका। नतीजा बहुत बड़ी आबादी अफरा-तफरी में है। अपने टूटली मड़ैया या बड़के पक्का मकान से बेदखल! राहत के इंतजार में। इंतजार किसी को कुछ दे जाता है, तो किसी को बेबसी के भँवर से निकाल नहीं पाता है। जान-माल की क्षति का कोई आकलन हो नहीं सकता। सारे आर्थिक क्रिया-कलाप, पढ़ाई-लिखाई, शिक्षोन्मुखी एवं रोजगारोन्मुखी परीक्षाएँ, जीवन में उल्लास की तलाश की हर प्रक्रिया स्थगित! बस एक लूट-सी मची रहती है, हर तरह की। और ख्वाहिश! बस एक ही ख्वाहिश, राहत! सुनने में बुरा लगेगा, कहने में भी बुरा लग रहा है लेकिन, यह सच हैकि राहत के भरोसे रहते-रहते हुए धीरे-धीरे राहत आदत में बदलने लगती है और राह पाने की कोई सुध नहीं रह जाती है। राहत कोई राह नहीं है। लानत ! उफ लानत।
जब बाढ़ का पानी उतरता है तो अपने पीछे लंबा हाहाकार छोड़ जाता है, यह अक्सर चित्र और क्लिपिंग्स में नहीं समाता, न दृश्य हाता है और न श्रव्य बस भोग्य होता है, जो भोगता है वही जानता है!
जब उतर जाये बाढ़ का पानी और बचा रह जाये आँख या आकाओं के किरदार में थोड़ा पानी तो कहना जरूरी होगा कि राहत के लिए तो शुक्रिया, लेकिन यह कोई राह नहीं है! हमें राहत की नहीं, अब राह की जरूरत है! कह पायेंगे हम! कहाँ कह पाते हैं, क्या पता कह भी दें। ध्यान रहे कहना है, सिर्फ बोलना पर्याप्त नहीं होगा! क्या!

शनिवार, 15 अक्टूबर 2016

घुटनों के बल परफूल, घुटनों के बल!

असली साहित्य भी वही है जिसे कैंपस में स्वीकृति है। साहित्यवाले/वाली तो फिर भी कैंपस के बाहर किसी तरह, उखड़ी-उखड़ी ही सही, साँस ले लेते /लेती हैं। अपनी बैठक, उठक-बैठक भी, कर लेते/लेती हैं। जैसे-तैसे जी लेते/लेती हैं। समाज में आते-जाते रहते /रहती हैं। लेकिन, समाजशास्त्रवाले /वाली तो, कैंपस के अवरोधकों को लाँघकर, समाज में जा ही नहीं पाते /पाती हैं। इतिहासवाले/वाली, कोशिश करते/करती हैं तो पुराण और मिथजीवी उन्हें ऐसा सिकोड़ देते हैं कि वे खुद को भी ठीक-ठीक पहचानने की स्थिति में नहीं रह जाते/जाती हैं। दर्शनशास्त्रवाले/वाली क्या करें! विचार की थाली सजाकर कैंपस की चौहद्दी से बाहर निकलते /निकलती हैं तो उनकी ऐसी उतारी जाती है कि बस दर्शनीय होकर रह जाते/जाती हैं! बहुत घुटन है परफूल। घुटन को घुटनों के बल होकर महसूस करो, शायद अक्ल ठिकाने आये! आखिर बाल-बच्चोंवाले गृहस्थ हो! गृहस्थी का ख्याल करो। और क्या कहें सिरीमान परफूल मोशाय! समझ रहे हैँ न!

शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

लेखक, अगर आदमी है. तो वह किसी का 'आदमी' नहीं होता

प्रभाकर श्रोत्रिय को श्रद्धांजलि
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लेखक, अगर आदमी है, तो वह किसी का ‘आदमी’ नहीं होता
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प्रभाकर श्रोत्रिय भारतीय भाषा परिषद के निदेशक बनकर कोलकाता आये थे। उनके यहाँ आने के पहले एक खबर यह आई या उड़ी कि वह आरएसएस का आदमी है। किसी लेखक के बारे में यह उड़ा देना कि वह फलाना का आदमी है कितना त्रासद होता है, इसका कुछ अनुभव तो मुझे रहा है। यकीन करने या नहीं करने का सवाल नहीं था, लेकिन सावधान रहने की ‘जरूरत’ थी। वागर्थ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ और धीरे-धीरे उनके बारे में अपनी धारणा बनने लगी। सावधानी शिथिल होती गई। यह बात पुष्ट होती गई कि लेखक असल में उस अर्थ में किसी का ‘आदमी’ नहीं होता, नहीं हो सकता है। मैंने उन्हें एक बेहतर संपादक और गंभीर लेखक के रूप में ही जाना। अपनी कई बुनियादी दृष्टि भिन्नताओं के बावजूद, उनके प्रति मन में सम्मान का जो भाव जगने और बनने लगा, आज भी सुरक्षित है। आज उनके नहीं रहने से मन खिन्न और दुःखी है कि हिंदी ने एक कुशल संपादक लेखक को खो दिया।
उन से जुड़ी कई बातें ध्यान में आ रही हैं। प्रीतिकर भी, अप्रीतिकर भी। लेकिन दो प्रसंग का उल्लेख करने से अपने को रोक नहीं पा रहा हूँ। वागर्थ में तो मैं लगभग लगातार लिख ही रहा था। स्वभावतः, भारतीय भाषा परिषद आना जाना लगा रहता था। ऐसे ही किसी काम से एक बार उन से मिलने भारतीय भाषा परिषद गया। उनके सहायक ने बताया आज मुलाकात नहीं हो सकती है। बहुत व्यस्त हैं। मेनेजमेंट की मीटिंग चल रही है। मिलना जरूरी था। संयोग से उसी समय वे बाहर निकले, तो मुझे देखा और अपने केबिन में बुला लिया। मैं ने कहा कि आप मेनेजमेंट की मीटिंग में व्यस्त हैं, मैं फिर कभी आ जाऊंगा! उन्होंने कहा कि मैं कोई मेनेजमेंट नहीं हूँ। उन्हें मेरी राय की जरूरत होगी तो वे दस मिनट इंतजार कर सकते हैं। आप चाय पी कर जाइये। चाय आने में जाहिर है कम-से-कम दस मिनट तो लगा ही होगा। इस बीच दो बार बुलावा आया। उन्होंने कहला भेजा कि एक लेखक आये हैं, थोड़ा इंतजार करें। वे आराम से चाय पीते रहे। वे दबाव में नहीं थे, दबाव में तो मैं था।
तब मोबाइल का चलन आम नहीं हुआ था, मेरे पास तो नहीं था। उन्होंने मेरे दफ्तर के फोन पर दृढ़ता से कहा कि तुरत मिलना चाहता हूँ। मैं जब उनके पास पहुँचा तो वे ऊपर से बहुत दुःखी और भीतर से बहुत क्रुद्ध थे। कुल मिलाकर कातर! कवि मान बहादुर सिंह  की हत्या से हम सभी स्तब्ध थे। उन्होंने कहा कि मान बहादुर सिंह  की कविता पर एक पृष्ठ की टिप्पणी लिखकर अभी दीजिये। वागर्थ के लिए। मेरे पास मान बहादुर सिंह की कविताएँ तत्काल उपलब्ध नहीं थी। पुस्तकालय में उनकी कविताओं के होने की संभावनाओं से वे पहले निराश हो चुके थे। कुछ कविताएँ वागर्थ की फाइल में थी। एक दो पत्रिकाओं में हम साथ-साथ छपे थे। लेकिन उन पत्रिकाओं के उन अंकों की प्रति के घर में होने के प्रति मैं आश्वस्त नहीं था। फिर भी मैं ने कहा कि अभी मैं इन कविताओं को ले जा रहा हूँ। घर में देख लेता हूँ। कल सुबह टिप्पणी दे जाने की कोशिश करूँगा। वे पहले तो चुप रहे, फिर बोले। ठीक है, ले जाइये। कल सुबह तक टिप्पणी नहीं मिली तो वागर्थ में एक पृष्ठ खाली जायेगा, इस उल्लेख के साथ की टिप्पणी नहीं उपलब्ध हो सकी। मैं ने जैसे-तैसे टिप्पणी लिखी, उन्हें समय पर दी और वह वागर्थ में छपी। मान बहादुर सिंह  की हत्या के संदर्भ में उनकी लेखकीय भंगिमा की करुणा और संपादकीय मुद्रा की दृढ़ता को मैं कभी भुला नहीं पाया। बाद के दिनों की बात! मान बहादुर सिंह के हत्यारे राज्य सरकार की कृपा से खुले आम दहाड़ रहे थे। हिंदी के एक बहु ख्यात कवि, बहुत सारे लेखकों के अनुरोध को ठुकराकर, राज्य सरकार से पुरस्कार लाभ कर रहे थे। नाम! जाने दीजिये यह अवसर नहीं है। कहना सिर्फ इतना है कि लेखक, अगर आदमी है, तो वह किसी का ‘आदमी’ नहीं होता।

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2016

एक चुल्लू पानी का है पता मालूम

हुस्न का गरूर, परवान चढ़े तो बस अब इश्क है, मजलूम
मुहब्बत झूठी ही सही, पर हूँ तो उसका ही बेतार तरन्नुम

सुना है, इस फागुन में कुछ अधिक ही खपत में है माजूम
हँसनेवाला, रोनेवाला कौन होश में है, है किसको मालूम

सहमा हूँ, कह न दे कोई प्यारे मुल्क को उम्मत-ए-मरहूम
बात गहरी नहीं उतनी एक चुल्लू पानी का है पता मालूम

गर्जन भी है, वर्जन भी है, अर्जन कहाँ बस यह नहीं मालूम
सीना जितना ही बड़ा उदर, डकार
में निकला नहीं हालूम

जल, जंगल, जमीन सब तो बस गोविंद के हैं, है ना मालूम
इतना मालूम है जब, तब गोविंद कौन बस यह नहीं मालूम

सारी अक्ल लगाई मादरे जुबान की अहमियत में, मालूम
मेरा वतन अब मदारी जुबान का है कायल कैसे नामालूम

मुहब्बत झूठी ही सही, पर हूँ तो उसका ही बेतार तरन्नुम
कहाँ ज्ञान का जन्नत और कहाँ भूख, गरीबी का जहन्नुम

बुधवार, 21 अक्टूबर 2015

पता नहीं देश चल रहा कि जल रहा है


सब कुछ सुरक्षित है अपनी जगह पूजा पाठ और ध्यान
व्यवस्था अवस्था संविधान शासन प्रशासन योगासन
जिस से भी चलता है देश
हाँ सभी मर्माहत हैं दुखी, उदास और परेशान
हर किसी के पास इस के लिए अपने-अपने कारण हैं

अपने-अपने कारणों और तरीकों से
दुखी उदास और परेशान होने का
मौलिक अधिकार हर किसी के पास है
हर कोई अपने-अपने कारणों के साथ
अपने मौलिक अधिकार के पक्ष में है तैयार
आइये मार्यादा में रहकर चैनलों पर बहस करते हैं
और यह पहली बार नहीं हुआ है
याद है न बेलछी, बाथे गोहाना, जाने कितने और नाम हैं

और फिर उसके बाद, और फिर उसके बाद
अबकी बार सुनपेड़ गांव, होता ही रहता है सरकार
मुआवजा आश्वासन न्याय के तो हैं सब-के-सब हकदार

पता नहीं देश चल रहा है कि देश जल रहा है









शनिवार, 19 सितंबर 2015

गुरुवार, 27 अगस्त 2015

सांप्रदायिक राजीनिति के मिजाज में आरक्षण का सवाल और बबाल

गुजरात में हार्दिक पटेल के नेतृत्व में पटेल समुदाय को आरक्षण का लाभ दिये जाने की माँग की हिंसक परिणति सामने है। इसके पहले भी गुर्जर और जाट इस तरह का आंदोलन करते रहे हैं। हिंसा और जबर्दस्ती भी कम-ओ-बेश इन सब का अंतर्निहित सच है। इन सब से मन बहुत ही व्यथित हो जाता है। यह लेख बहुत ही व्यथित मन से लिखा गया है। उम्मीद के आकाश में चिंता की लकीरों को नजर अंदाज किये बिना भी भरोसा यह है कि सोच, समझ, तर्क और विचार और असहमति को जीवन से पूरी तरह खेदेड़ नहीं दिया गया है।
बिहार में चुनाव का परिदृश्य है। इस परिदृश्य का क्या महान दृश्य है कि ‘हिंदु एकता के लिए समर्पित एकात्म-मानववाद के पैरोकार’ जाति के शौर्य से खुद को अलंकृत कर रहे हैं। मुहावरे के तौर पर कहा और माना जाता है कि ‘कमंडल की सांप्रदायिक राजनीति’ का मुकाबला करने के लिए ‘मंडल की जाति आधारित राजनीति’ को अपनाया गया। ‘कमंडल की सांप्रदायिक राजनीति’ का मुकाबला करने की बात सचमुच रही हो तो इसमें एक बुनियादी भूल थी। भूल यह कि  जाति आधारित राजनीति, सांप्रदायिक राजनीति के विरुद्ध दिखती हुई भी कभी उसका वास्तविक विकल्प नहीं रच सकती। नतीजा यह हुआ कि आज ‘कमंडल की राजनीति’ मंडल की राजनीति में समाहित होकर राजनीतिक धुंध, धुआँ, क्रोध, फरेब, तर्कहीनता, विचारहीनता उगल रही है और आत्म-विभाजन, विध्वंस, अंतर्ध्वंस की यह नकारात्मक स्थिति ऊपरी तौर पर हर तरह की विषमता की जननी पूँजूवादी सोच को अपने लिए मुफीद लग रही है। यहाँ से देखें तो जनतंत्र के बहुमतवाद को बहुसंख्यकवाद और फिर बहुसंख्यकवाद में बदलने और जनतंत्र के भीड़तंत्र में बदलने की प्रक्रिया भी साफ दिखेगी।
बावजूद इन सब के, यह स्वाभाविक है कि नकारात्मक भेदभाव से भरी व्यवस्था के बुरे असर को दूर करने के लिए जिन आधारों पर नकारात्मक भेदभाव होता है उन आधारों पर ही सकारात्मक भेदभाव का उपाय कर संतुलन हासिल करने का इंतजाम किया जाना चाहिए। भारतीय समाज व्यवस्था जाति के आधार पर बँटी है, इस बात से मुहँ चुराने का कोई मतलब नहीं। यह बात भी माननी होगी कि समतामूलक समाज ही संतुलित समाज होता है, जिस समाज में समता नहीं वह समाज कभी संतुलित नहीं रह सकता। समता के लिए अपने को सर्वाधिक सिद्धांतबद्ध राजनीतिक विचारधारा के पैरोकारों ने, अपने वर्ग-बोध पर जरूरत से ज्यादा जड़मतित्व के कारण, भारतीय समाज के जाति आधार को तो कभी ढंग से समझने की कोशिश ही नहीं की, इसके बुरे प्रभाव से मुक्ति के उपाय सोचने की तो बात ही क्या!
आजादी के आंदोलन के दौरान एक आधुनिक राजनीतिक राष्ट्र के रूप में भारत पुनर्गठित हो रहा था। आधुनिक राजनीतिक राष्ट्र के रूप में भारत पुनर्गठित होने की राजनीतिक प्रक्रिया में ही बाबा साहेब ने सामाजिक संतुलन के सवाल को पूरी बौद्धिक ताकत के साथ उठाया। आधुनिक राजनीतिक राष्ट्र के रूप में भारत पुनर्गठन के इतिहास में दिलचस्पी हो तो इसे सही परिप्रेक्ष्य में सही ढंग से समझा जा सकता है। बाबा साहेब के सवालों की वैधता और आधुनिक राजनीतिक राष्ट्र के रूप में राजनीतिक भारत की अंदरुनी शर्त्तों के पूरा करने के लिए नकारात्मक भेदभाव को दूर करने के लिए सकारात्मक भेदभाव का प्रावधान किया गया। माना गया कि नकारात्मक भेदभाव का बड़ा आधार जाति है इसलिए स्वाभाविक है कि सकारात्मक भेदभाव के प्रावधान का आधार जाति को बनाया गया। सकारात्मक भेदभाव के यही प्रावधान आरक्षण के रूप में परिचित और प्रचलित है। मूल रूप से यह माना जाना चाहिए कि आरक्षण के प्रावधान नकारात्मक भेद भाव को दूर करने के लिए थे पिछड़ापन दूर करने के लिए नहीं, क्योंकि सकारात्मक भेद भाव से पिछड़ापन के दूर होने की गुंजाइश बहुत कम, न के बराबर होती है। किसी पिछड़े राष्ट्र में पिछड़ापन उस राष्ट्र में रहनेवाले सभी लोगों का छोटा-बड़ा सच होता है। आगे चलकर राजनीतिक कारणों से, कह लें जनतंत्र में वोट संग्रह के अपने महत्त्व के राजनीतिक कारणों से, आरक्षण के प्रावधान को पिछड़ापन दूर करने का माध्यम बताया और माना जाने लगा। आरक्षण को पिछड़ापन दूर करने का माध्यम मान लेने से पिछड़ापन का आधार जाति को मानना इसी राजनीतिक बोध के अंतर्गत जरूरी हो गया। कह लें, जाति की वोटर संख्या के बड़े आकार के आकर्षण के कारण पिछड़ापन का आधार जाति को मानना जरूरी हो गया। यही वह बिंदु है जहाँ से आरक्षण का प्रावधान नकारात्मक भेदभाव को दूर कर सामाजिक संतुलन हासिल करने के उपाय से बदलकर राजनीतिक शक्तिसंयोजन के विशेषाधिकार का आधार बन गया। इसके दो भयानक परिणाम हैं; पहला यह कि जाति आधारित नकारात्मक भेदभाव को दूर करने की जरूरत से एक राष्ट्र के रूप में हमारा ध्यान भटक गया और दूसरा यह कि नकारात्मक भेदभाव को दूर करने का सकारात्मक उपाय अपने प्रभाव में नकारात्मक हो गया। यानी जिस बुराई को दूर करने के लिए आरक्षण का उपाय किया गया था, आरक्षण उसी को हवा देने लगा।
अब हार्दिक पटेल की लाइन दोनों करफ से आग लगाने पर आमादा है। क्या अद्भुत तर्क है कि या तो हमारे समुदाय को भी आरक्षण दो या फिर किसी समुदाय को मत दो! गुजरात में हार्दिक पटेल के आह्वान पर जुटी भीड़ के मिजाज और लिबास को मीडिया में देखने से लगता ही नहीं है कि यह वंचित या पिछड़े समुदाय का जमावड़ा है। यह विशुद्ध रूप से जाति के लिए राजनीतिक विशेषाधिकार को हासिल करने के लिए शक्तिसंयोजन का व्यायाम है। हालाँकि, राजनीतिक नफा-नुकसान के बाहर इस माँग को मानने का कोई औचित्य नहीं है, लेकिन राजनीतिक कारणों से इस व्यायाम का समर्थन करनेवाले प्रभावशाली लोगों की कोई  कमी नहीं है। इस व्यायाम की हिंसक गतिविधियों के कोलाहल में राजनीतिक प्रभुसत्ता के दुरुपयोग, अहंकार और आक्रामकता से पैदा हुए सारे सवाल तात्कालिक रूप से नैपथ्य में चले जायेंगे चाहे वे व्यापमं की विराटता से जुड़े हों, ललित गेट से जुड़े हों, कोलगेट से जुड़े हों, अंगुली पर गिने जाने लायक घरानों के पास अकल्पनीय बकाया की ना-वसूली से जुड़े हों।
हार्दिक पटेल की माँग का औचित्य नहीं है! तो क्या आरक्षण को पूरी तरह समाप्त कर दिया जाना चाहिए? मेरा ख्याल है कि नहीं, आरक्षण को पूरी तरह समाप्त करने का वक्त अभी नहीं आया है। हाँ यह जरूर किया जाना चाहिए कि आरक्षण के प्रावधान को नकारात्मक भेद भाव को दूर करने के लिए सकारात्मक भेद भाव के उपाय तक सीमित किया जाना चाहिए, इसे जाति की वोटर संख्या के बड़े आकार के राजनीतिक आकर्षण में पिछड़ापन दूर करने का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए। धर्म आधारित सांप्रदायिक राजीनिति के मिजाज में जाति आधारित आरक्षण का सवाल और बबाल अभी और क्या रुख अख्तियार ग्रहण करता है यह तो वक्त ही बतायेगा। फिल वक्त तो यह कि मन बहुत व्यथित है और गलत समझ लिये जाने के जोखिम पर भी यह कहना बहुत जरूरी है कि अब और नहीं!

सोमवार, 24 अगस्त 2015

जनतंत्र में पक्ष विपक्ष

सरकार बनानेवाला संसदीय दल या दलों का समूह संसद में पक्ष और सरकार बनाने की प्रक्रिया से बाहर के दल या दल समूह विपक्ष कहलाता है। पक्ष का हो या विपक्ष का संसदीय दल अपने-अपने राजनीतिक दलों से इस अर्थ में भिन्न होता है कि राजनीतिक दल का प्रत्येक सदस्य जनप्रतिनिधि नहीं होता है जबकि संसदीय दल का प्रत्येक सदस्य होता है। जैसे सरकार पूरे देश की होती है वैसे ही विपक्ष भी सारे देश का होता है। दलों के राजनीतिक हितों का अनिवार्य विरोध और संघर्ष संसदीय हितों के अनिवार्य टकराव या विरोध में बदल जाये तो अंततः जनतंत्र क्षतिग्रस्त हो जाता है। राजनीतिक जन संघर्ष और संसदीय जनप्रातिनिधिक संघर्ष के तरीके और तमीज में अगर फर्क मिटा दिया गया तो संसद के सत्र कामकाज के बदले राजनीतिक रैलियों में बदल कर रह जाने से खुद को बचा नहीं पायेंगे। यह जनतंत्रीय व्यवस्था के लिए शुभ नहीं है।
किसी मुद्दे पर सिर्फ उन लोगों को, जिनका दलीय अवस्थान जगजाहिर है और जिनका अपना मत अपने विवेक के बदले अपने दल से ही तय होने के लिए बाध्य है को बुलाकर मीडिया में चर्चा करना चर्चा को कोलाहल में बदलना है। मीडिया को चाहिए कि वह खुद को पूरी तरह से पॉलिटिकल स्फीयर में बदलने से यथासंभव बचते हुए पब्लिक स्फीयर में बने रहने की कोशिश करे। सरकार के समर्थन या विरोध के बदले नीतियों और मुद्दों के औचित्य या अनऔचित्य पर उन लोगों के लिए जगह बनाये जो न तो संसद में बोल सकते हैं न सड़क पर बोल सकते हैं, लेकिन जिनका बोलना महत्त्व का हो सकता है।
अन्यथा देश और देश की व्यवस्था को अबांछित फाट से बचाना बहुत मुश्किल होता जायेगा।

शनिवार, 22 अगस्त 2015

अनहद नाद

ज्ञान की चरमावस्था मौन है।
मौन में शब्द नहीं होता नाद होता है।
शब्द में ध्वनि होती है नाद में व्याप्ति।
यह व्याप्ति जब अव्याप्ति में बदलती है तब नाद अनहद हो जाता है और आदमी कबीर।
अनहद के ऊपर प्रेम होता है - - - एकै अषिर पीव का कहते हैं कबीर। इसलिए प्रेम ही सबसे बड़ा गुरु है सबसे बड़ा पाठ!

गुरुवार, 20 अगस्त 2015

लग गई बोली

जनतंत्र की ये हँसी ठिठोली!
लो बिहार की लग गई बोली!
आये लेकर भरी हवाई झोली!
हँसकर धीरे-से मुट्ठी खोली!

ये बिहार है और जनता है भोली
पैसे से मिलती नहीं यहाँ रंगोली
जयकारे में मगन मूर्खों की टोली
काशी अब कोशी ने सुनी ठिठोली

शनिवार, 15 अगस्त 2015

टचयुग की महिमा : टचमेव जयते

शास्त्र-पुराणों की बात नहीं जानता। बस इतना समझ में आ रहा कि न सत युग, न कलियुग यह टचयुग है। हर तरफ टच की महिमा है। टच की महिमा से काक पिक, बक मराल बन जाता है ▬▬ बिन टच कुछ काम न होई, टच करो देवा! टच है तो सारे काम चट से हो जाते हैं। टच न हो तो सारे मंसूबों को कोई भी चट कर जाता है। टच से साधारण मिठाई प्रसाद में बदल जाता है। आइडियोलॉजी को टच कर लेने पर बहुत आसानी से बकवास विचार में बदल जाता है। कोई बड़े काम पर निकलता है तो मंदिर को टच करते हुए निकलता है। बड़े साहेब से मिलने के पहले बड़े बाबू को टच कर लेना लाभजनक होता है। छात्र परीक्षा हॉल में घुसने के पहले पुस्तक को फाइनल टच देता है। फाइनल टच माने परीक्षा खत्म हो जाने के बाद जीवन में फिर कभी उसे टच करने की कोई जरूरत नहीं रह जाती है। प्रत्याशी बनने का लाभ उन्हें ही मिल पाता है जो टचाशी बनने में सफल होते हैं।

हमने देखा है, वे जो भी कहते हैं टच करने के बाद ही कहते हैं। उनकी बात टच कर जाती है। वे टचेश्वर हैं उनको टच करने का हक है। कोई दूसरा उन्हें क्या उनके घेरे के आस-पास को भी टच करे तो वे बड़े टची हो जाते हैं। कुछ टच बाबा तो जेल चले गये हैं, सुना है वे वहाँ भी टचयोग में लगे हुए हैं बाकी टचस्वामी बाहर में ही टचहील कर रहे हैं। इस टच काल में भाग्य लक्ष्मियाँ टच विद्या और टच निपुणता पर ही मुग्ध होती हैं; भागती लक्ष्मियाँ भी। अब नामकरण में भी युगानुरूप बदलाव दिखना चाहिए। नया नाम कुछ इस प्रकार का हो सकता है ▬▬ टचनाथ, टचेंद्र, टचकारी, टचोदय, टचकिशोर, टचभद्र, टचख्यान, टचू बाबू, टचराज, टचेश्वरी, टचकी, टचीता, टचांगी, टचानी आदि। गानों में कहा जायेगा ▬▬ तू कहीं भी जाये मेरा टच तेरे साथ होगा। युवा झूमते हुए गायेंगे ▬▬ वो साँई मेरा भी टच करवा दे, नहीं पूरा तो थोड़ा करवा दे, दे दे कोई तो टच करवा दे। बस-ट्रेन के अधिकतर नित्य यात्री टचा-टची की कृपा से ही आवगमन के कष्ट को हँसते-हँसते सह लेते हैं।

‘बड़े स्मार्ट हो जी’ कहने पर प्रशंसा का वह सुरूर कहाँ चढ़ता है जो ‘बड़े टचाश हो जी’ कहने पर चढ़ता है। मन झूमकर आँखों-आँखों में कहता है ▬▬▬ बार-बार कहो, टचाश कहलाना अच्छा लगता है। टचाश विज्ञापन ▬▬ आनंद भरपूर, टचानंद; टच करो, चट करो। अभी टचकारी बाबू कह गये हैं, आपका कुछ नहीं हो सकता, आप किसी के टच में नहीं रहते हैं। खैर अभी वक्त है। टच में रहने की कोशिश कीजिये। उनकी बातें टच कर गई हैं। हाय टचकारी बाबू! आप भी क्या खूब टच करते हो! अब कभी मौका आया तो पत्र ‘आदरणीय श्री’ से नहीं कर, ‘टचश्री’ शुरू करने का तथा समापन ‘आपका कृपाकांक्षी’ या ‘आपका स्नेहाकांक्षी’ जैसी सड़ियल मनोरथ-विज्ञापी पदों से नहीं कर ‘आपका टचाकांक्षी’ या ‘आपका टचाशी’ जैसे चट-असरकारी पदों से करने का इरादा पक्का होता जा रहा है। आपकी बात आप जानें.. मैं तो आपका टचाकांक्षी...
टचमेव जयते 

शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

जश्न-ए-आजादी

जश्न - ए-आजादी में हूँ शरीक जरूर
मगर भुलाये नहीं बनता कि हम ने
कई बेड़ियाँ बनाई अपनों के लिए

कबूल हो दिल से कि उन जज्बातों को
भूलते चले गए जो थे जरूरी बहुत पुर-अम्न आजादी के सपनों के लिए

बात बढ़ाने का फायदा ही क्या मुख्तसर यह कि हम मुफीद बनते चले गए चाहे जैसे भी हो मुमकिन आजादी में अड़चनों के लिए

न ख्वाबों को जिलाये रख सके न हकीकतों और ना ही हकों के लिए कुछ खास कर सके, न बहुवचनों के लिए

जब संवेदनशीलता ही चुक गई तो संवाद क्या सब कुछ समर्पित होना ही था बेशर्म बतकुच्चनों के लिए

जश्न - ए-आजादी में हूँ शरीक जरूर
मगर भुलाये नहीं बनता कि हम ने
कई बेड़ियाँ बनाई अपनों के लिए

बुधवार, 29 जुलाई 2015

अब क्या कहें

तेरे हाथ में दस्ताना और जुबाँ पर दोस्ताना है
तेरे किरदार का कुछ तो अंदाज कातिलाना है

चोट हर बार बेशक नई से नई किस्सा तो पुराना है
थैली में विष तो मुट्ठी में हँसता हुआ हर्जाना है

शर्म आती बहुत जो यह सलूक बहुत बहशियाना है
जुल्म, जुमला, जुर्म को जो कहता करतूत मर्दाना है

दर्द तेरा हो कि मेरा हो प्रेमचंदी निगाह में सारा जमाना है
बिगाड़ के डर से ईमान की बात जानता हर कोई छिपाना है

हालात ऐसे कि आवाम बे-कदर अपने ही गम से बेगाना है
मेरी जान सच मान हँसी तेरी अब भी खुशी का खजाना है

शनिवार, 18 जुलाई 2015

तालीम-तलब से बगरू

यूँ तो तस्वीरों में कभी खुद को सुर्खरू लगता हूँ
हकीकत में ना जाने क्यों बहुत उकरू लगता हूँ

किसी बात पर अड़ जाता और जकरू लगता हूँ
कमजोर भीतर से कि बाहर से जबरू लगता हूँ

ऐसी लड़ाई खुद से कि खुद को झगरू लगता हूँ
बक-बक बक-बक करता इतना बकरू लगता हूँ

तकौनी में बीती जिंदगी तीसरा पठरू लगता हूँ
ऋण-मुक्त नींद की चाह विकल बदरू लगता हूँ

हमकलामी में तालीम-तलब से बगरू लगता हूँ
फिर-फिर लौटता इस मामले में हेहरू लगता हूँ

गुरुवार, 16 जुलाई 2015

रहा सो रहा

जी हाँ किसी ने कुछ नहीं कहा
हर किसी ने अपना दुख सहा

और उसका इंतजार बना रहा
ढाल नहीं छाता-सा तना रहा

सभा में बोलता खामोश रहा
और खामोश ही बोलता रहा

जितना ऐंठा, अहं ढहता रहा
हरियरी में जंगल जलता रहा

हाँ अबोला को ही सुनता रहा
जो नहीं बोला उसे धुनता रहा

कहिये कि अब जो रहा सो रहा
किस के सामने जो अब रो रहा

मंगलवार, 14 जुलाई 2015

लोकशाही में शाही लोक!!

लोकशाही में शाही लोक!!
शोक ही शोक, अरे बाप रे कितना शोक
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उग्र नौकरशाह
व्यग्र जनतंत्री बादशाह
सक्रिय धन शाह
खनन शाह, मनन शाह
मदन शाह, मिलन शाह
गली शाह, मुहल्ला शाह
जिला शाह, हल्ला शाह
तंत्र शाह, मंत्र शाह
शाहों के शाह, शाहंशाश
आह-आह इतने शाह!
वाह-वाह कितने शाह!!
इत शाह, उत शाह,
तरह-बेतरह के शाह
सब में है भरपूर उत्साह
जनतंत्र में तंत्र शाह!
जन-गण-मन?? हतोत्साह!!!
हत उत्साह! हतोत्साह!!!

लोकशाही में शाही लोक!!
शोक ही शोक, अरे बाप रे कितना शोक!

मंगलवार, 7 जुलाई 2015

विकास का मतलब

भारत जब आजाद हुआ तो इसके समक्ष कई चुनौतियाँ थीं लेकिन आर्थिक विकास की चुनौती सबसे भारी थी। आर्थिक विकास के लिए दो चीजों की आवश्यकता थी, पहली योजना की और दूसरी उस योजना पर अमल करने के लिए आवश्यक धन की। योजना का ढाँचा पंचवर्षीय योजना के रूप में एक मॉडल तो मिल गया, लेकिन धन की आवश्यकता तो कर्ज से ही पूरी हो सकती थी। यह कर्ज भी तभी हितकर हो सकता था जब कठोर राजस्व अनुशासन का पालन उतनी ही कठोर नैतिक दृढ़ता से होता। कर्ज तो कठिन-आसान शर्त्तों पर मिल गया लेकिन राजस्व अनुशासन का पालन नैतिक दृढ़ता से नहीं हो पाया। हम ऋण की राशि का भी भोग-उपभोग करने से अपने को बरज नहीं पाये। प्रेमचंद ने कहा था, कर्ज वह मेहमान है जो एक बार आ जाता है तो फिर आसानी से जाता नहीं है। महात्मा गाँधी ने इशारा किया था कि अपनी आवश्यकता को शून्याभिमुखी बनाना जरूरी है, हमने इस पर कान नहीं दिया। कर्ज के माध्यम से विकास के जिस पिछलन भरे रासते पर हम चल पड़े, वह नैतिक, राजनीतिक, सामाजिक और यहाँ तक कि आर्थिक पतन की ओर हमें तेजी से ले गया। एक करुण उदाहरण के तौर पर देखें कि कैसा है यह दुश्चक्र! किसान आत्महत्या पर मजबूर क्यों होता है? जवाब है, कर्ज के दबाव के कारण। इससे मुक्ति का रास्ता क्या है? जवाब है, कर्ज उपलब्ध करवाया जाये। आज विकास का मतलब कर्ज हो गया है! जब चार्वाकों ने ऋण लेकर घी पीने की बात कही थी तो, अभिप्राय यह नहीं था। 

बुधवार, 17 जून 2015

आशंकाओं के काँटे

वह आशंकाओं के काँटे 
तीखे होते जा रहे हैं 
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जिस दिशा में स्थितियां गतिशील हो रही है वह सामान्य नहीं लक्षण नहीं है। सत्ता, विभिन्न प्रकार की और बहुस्तरीय सत्ताओं के गलियारों में चल रही अंदरुनी चालबाजियों और बाहरी गतिविधियों से जो संकेत संवाद माध्यम से (इनकी कतिपय सीमाओं और रणनीतियों के बावजूद) मिल रहे हैं वे स्थिति के तेजी से असामान्य होते जाने की आशंकाओं को पुष्ट करते प्रतीत होते हैं। संवैधानिक संस्थाओं की जनपक्षीय संवेदनशीलता भारी नैतिक गिरावट के व्यूह में पहुंचती जा रही है। संवैधानिक रूप से आंतरिक आपातकाल की घोषणा न भी हो, कार्यशैली में आपातकालीन कार्यशैलियों और स्वेच्छाचारिताओं का प्रभाव तो झलक ही रहा है। शायद, स्थिति उस से और भी भयानक है जितनी की आशंका लालकृष्ण आडवाणी व्यक्त कर रहे हैं। इसलिए कि यह 20 वीं नहीं 21 वीं सदी है। ध्यान में होना चाहिए कि 20 वीं सदी में जनतांत्रिक गुणवत्ता के प्रति जन आस्था शिखर पर थी, जबकि 21 वीं सदी में जनतांत्रिक गुणवत्ता के प्रति जन आस्था में भयावह गिरावट है। यह जनतांत्रिक गुणवत्ता के प्रति जन आस्था में भयावह गिरावट का ही एक सामान्य लक्षण है कि लगभग सभी (70 में 67) सीट पर जीत हासिल कर सरकार बनानेवाली राजनीतिक पार्टी की अंदरुनी कमजोरियों की बाहरी दुर्गति इतनी जन प्रतिक्रया विहीन है! आशंकाओं के काँटे तीखे होते जा रहे हैं। क्या कहते हैं!

अफसोस! 
सिक्का का दोनो पहलू खोटा है 
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सही बात तो यह है कि अन्य बातों के अलावा, नागरिक जमात की संभावनाओं के सत्ता के राजनीति में त्रासद पर्यवसान उनके नाम दर्ज है। लेकिन इन बातों से उनके दल के खिलाफ जिस तरह से प्रतिशोधी आचरण किया जा रहा है वह संवैधानिक और जनतांत्रिक तो क्या राजनीतिक रूप से भी सही और शुभप्रद नहीं है। मुश्किल यह कि सिक्का का दोनो पहलू खोटा है!

शनिवार, 13 जून 2015

विश्वास अंधा होता है!

जहाँ ज्ञान की सीमा, बाहरी और भीतरी दोनों, समाप्त होती है विश्वास का क्षेत्र शुरू होता है। ज्ञान, संदेह के अलावे, हर बात पर संदेह करता है। आधुनिकता का प्रारंभ रेने देकार्त के संदेह करने से होना माना जाता है। आधुनिकता का संबंध ज्ञानोदय से है। आधुनिकता अंधविश्वास से टकराती है। संदेह ज्ञान से ऊपजता है। जहाँ ज्ञान ठहर जाता है, वहीं संदेह रुक जाता है, जहाँ ज्ञान और संदेह दोनों साथ छोड़ जाते हैं, विश्वास आदमी को और आदमी विश्वास को थाम लेता है। ज्ञान का ठहर जाना आँख का साथ छोड़ जाना होता है। जिनकी दृष्टि दृश्य के पार, बुद्धि और ज्ञान के सहारे, हमेशा कुछ टटोलती रहती है, वे विश्वासी नहीं होते हैं। जिनकी दृष्टि दृश्य के पार देखने की संभावनाओं को नहीं टटोलती वे विश्वास के क्षेत्र में प्रवेश कर जाते हैं। पूर्ण अंधत्व पूर्ण विश्वास का शर्त्तिया आधार होता है।

कहा जाता है कि प्रेम अंधा होता है। क्योंकि प्रेम का आधार पारस्परिक विश्वास होता है। संवेगात्मक परस्पराश्रयिता Emotional Mutual Dependency पारस्परिक विश्वास की विधायिका होती है। ज्ञान और विश्वास से प्रेम के संबंध में प्रेम के पक्ष का महत्त्व जब माधव किसी तरह से उद्धव को नहीं समझा पाये तब उन्हें प्रेम पोषिता गोपियों के पास भेज दिया। उद्धव के वहाँ पहुँचने के पहले गोपियों ने समवेत रूप से तय कर लिया न उद्धव का ज्ञान लेना है और न माधव का प्रेम देना है। हिंदी लोक के मन यह उक्ति बैठ गई--- न उधो का लेना, न माधो का देना! Emotional Mutual Dependency में से पारस्परिकता-- Mutual-- गायब हो जाने पर सिर्फ संवेगात्मक आश्रयिता------ Emotional Dependency बचती है। सामान्य उदाहरण लें तो यह प्रथमतः शगुन विचार में प्रकट होता है और अंततः रोजमर्रा के अन्य व्यवहार में विकट होकर समाया रहता है। संदेह होगा तो विश्वास नहीं और विश्वास होगा तो संदेह नहीं। आदमी के ज्ञान की सीमा बहुत जल्दी प्रकट हो जाती है और विश्वास के क्षेत्र में वह जल्दी ही प्रवेश कर जाता है, इसलिए सामान्य लोगों की बात ही क्या कई बार बड़े-बड़े वैज्ञानिक भी शगुन विचार से बाहर नहीं निकल पाते हैं! पढ़े-लिखे, शिक्षित लोगों की अंगुलियों में ग्रह शांति की मुद्रिकाएँ अधिक शोभायमान होती हैं! आदमी के ज्ञान की सीमा चाहे जितनी जल्दी प्रकट हो जाये लेकिन मि. विश्वास के घर (प्रसंगतः, वी. एस. नयपॉल की एक किताब का यह नाम है।) में वह अतिथि ही होता है और अधिक देर तक नहीं ठहरता है। जिंदगी ज्ञान और विश्वास दोनों के सहारे चलती है! 

सृष्टि में सारी चीजें एक दूसरे से जुड़ी हैं। जुड़ाव एक अपर को आश्रय देता है। लेकिन आश्रय की मात्रा एक स्तर तक बढ़ जाने के बाद ही कोई एक चीज दूसरे से पर आश्रित होती है।

दोस्ती का मूलमंत्र है अनाश्रित भरोसा 

-- Non-dependent dependability

जिसे हम मुहब्बत कहते हैं, उसे संवेगात्मक परस्पराश्रयिता-- Emotional Mutual Dependency के रूप में समझा जा सकता है। संवेगात्मक परस्पराश्रयिता की मात्रात्मक स्थिति की पारस्परिकता हमेशा एक जैसी नहीं रहती है, एक खास परिवृत्त -- Range--- में गतिमान रहती है। संवेगात्मक परस्पराश्रयिता की मात्रात्मकता की अधिकता के अधिक समय तक एक मान पर स्थिर रहने या पारस्परिकता में असंतुलन बढ़ जाने से से व्यक्तित्व में एक अव्यवस्था उत्पन्न हो जाती है जिसे Emotional Dependency Disorder के रूप में समझा जा सकता है। इसे दूर किया जा सकता है...

पूरी सृष्टि में परस्पराश्रयिता सक्रिय रहती है। इस नैसर्गिक परस्पराश्रयिता के साथ सभ्यता में सहमति, लेकिन अधिकतर मामलों में वस्तुतः असहमति, के आधार पर सामाजिक संबंधों में परस्पराश्रयिता सक्रिय रहती है। संवेगात्मक परस्पराश्रयिता-- Emotional Mutual Dependency के अलावे भी बहुत सारी Dependencies हैं। वित्तीय, सामाजिक, आदि, इन सभी प्रकार की परस्पराश्रयिताओं को Power Dependencyकह सकते हैं। यहाँ Power से मुराद उस प्रविधि से है जिस से आकांक्षित/ इच्छित परिणाम हासिल होता है। मुख्यतः भौतिक परिस्थितियों और कठ-अहं---- False Ego और संघाती संवादों - Conflicting Communication के कारण Emotional Mutual Dependency (मुहब्बत) में से कभी Emotional पक्ष तो कभी Mutual पक्ष, तो कभी दोनों पक्ष कमजोर पड़ने लगता है, या गायब हो जाता है, लेकिन Dependency के बनी रहने तक संपर्क --- मधुर न सही, असंतुलित ही सही--- बना रहता है। Emotional Mutual Dependency असंतुलित होकर अंततः Power Dependency में बदल जाती है। Power Point पर प्रभुत्व जमाकर बैठा पक्ष यदि Power Dependency को संतुलित करने के विवेक और कौशल का इस्तेमाल नहीं करता है तो संवेगात्मक परस्पराश्रयिता Emotional Mutual Dependency का तत्त्वांतरण संवेगात्मक गुलामी---- Emotional Enslaving में होने लगता है और संवेगात्मक अतिचार---- Emotional Torture के रूप में प्रकट होता रहता है। मुहब्बत का रिश्ता हो या रिश्ते के किसी रूप में मुहब्बत हो इस में आज संवेगात्मक अतिचार---- Emotional Torture बढ़ रहा है तो इसे Power Discourse के रूप में समझते हुए बढ़ती हुई Power Dependency को दूर करने/ कम करने के लिए सचेत होकर Power Point की निर्मिति को समझना जरूरी है। संवेगात्मक अतिचार---- Emotional Torture आदमी को तोड़कर रख देता है!! खुद को और खुद से जुड़ो लोगों को संवेगात्मक अतिचार---- Emotional Torture से बचाना जरूरी है। क्या कहते हैं आप!